बुधवार, 26 जुलाई 2023

*श्री रज्जबवाणी पद ~ १७७*

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*कह्या हमारा मान मन, पापी परिहर काम ।*
*विषयों का संग छाड़ दे, दादू कह रे राम ॥*
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग कान्हड़ा १५ (गायन समय रात्रि १२ से ३)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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१७७ । दादरा
मन मान सीख मेरी,
त्रिगुण त्याग निर्गुण लाग, मनसा१ गहि२ फेरी ॥टेक॥
पंच बंधि३ अगम संधि४, रैन दिवस टेरी ।
सब सकेलि५ ब्रह्म मेलि६, परम गति नेरी७ ॥१॥
सकल झूठ देहु पूठ, ज्ञान नैन हेरी८ ।
रज्जब जोध मन प्रमोध९, ॠद्धि सिद्धि चेरी ॥२॥८॥
✦ अरे मन ! मेरी शिक्षा मान, त्रिगुणात्मक संसार का राग त्यागकर निर्गुण ब्रह्म के भजन में लग । बुद्धि१ को संसार की ओर जाने से पकड़२ कर ब्रह्म की ओर बदल,
✦ पंच ज्ञानेन्द्रियों को निग्रह३ करके अगम ब्रह्म में जोड़४, मैं रात्रि दिन तुझे बारं बार पुकार कर कह रहा हूं, अपनी इन्द्रियों को सबसे समेट५ कर ब्रह्म से मिला६ अर्थात ब्रह्म परायण कर फिर तो मोक्ष रूप परमगति तेरे पास७ ही आ जायेगी । 
✦ सब संसार मिथ्या है, इसको पीठ देकर ज्ञान नेत्रोंसे ब्रह्म का साक्षात्कार८ कर । अरे मन रूप योद्धा ! तेरे को यही उपदेश९ है, यदि तू मानेगा तो ॠद्धि सिद्धि तेरी दासी होकर रहेंगी ।
(क्रमशः)

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