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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
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*दादू जग दिखलावै बावरी, षोडश करै श्रृंगार ।*
*तहँ न सँवारे आपको, जहँ भीतर भरतार ॥*
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*लोक दिखावा विरह कौ अंग ॥*
हांजी कहै त होइ भल, नांजी कहैं बिनास ।
बषनां कहि नैं क्यूँ बणैं, गहिली सौं घर बास ॥३॥
हाँ में हाँ मिलाने पर प्रसन्नता होती है । इसके विपरीत ना कहने पर अप्रसन्नता किंवा बैर विरोध होता है । पागल स्त्री के साथ घरवास = गृहस्थधर्म निभाने पर कहिये किस प्रकार गृहस्थ सुख की प्राप्ति हो सकती है ? इसी प्रकार जगत् के साथ जागतिक जैसा व्यवहार तथा भक्तों के साथ रहते समय भक्तों जैसा व्यवहार यदि किसी साधक का हो तो बताइये कैसे उसे परमानंद स्वरूप परब्रह्म-परमात्मा का साक्षात्कार हो सकता है ? कदापि नहीं हो सकता है ॥३॥
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आया प्रेम कहाँ गया, देषै था सब कोइ ।
हँसताँ बार न रोवताँ, बषनां प्रेम न होइ ॥४॥
जो परम प्रेमास्पद के प्रति प्रेम उत्पन्न हुआ था, जिसे सभी ने देखा था, अब वह कहाँ गया ? वस्तुतः प्रेम वह नहीं है जो आता-जाता = उत्पन्न-विनष्ट होता है । प्रेम वह भी नहीं है जिसमें साधक एक क्षण में रोने लगता है और दूसरे क्षण में हँसने लगता है । यथार्थ में प्रेम वहाँ होता है जहाँ वह प्रतिक्षण बढ़ता है, घटने का नाम तक नहीं लेता । जहाँ स्वार्थ की गन्ध तक नहीं होती । “गुणरहितं कामनारहितं प्रतिक्षण वर्धमानमविछिन्नं सूक्ष्मतरमनुभवरुपम् ॥” नारद भक्तिसूत्र ५४ ॥ मात्र परम प्रेमास्पद के सुखी होने का ही खयाल रहता है । प्रेम प्रदर्शन का विषय न होकर अनुभवरूप है । गोपीप्रेम का आदर्श हैं “तत् सुखी सुखित्वम्” । स्वयं के सुखी होने की चाहना का सर्वथा अभाव किन्तु प्रेमास्पद को सुखी करने में ही सुख का अनुभव करना ॥४॥
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आया होइ तौ जाइ क्यौं, न पीड़ा न पुकारि ।
लोक दिखावा करै थी, बषनां माथै मारि ॥५॥
वास्तविक प्रेम के बार हो जाने पर समाप्त तो क्या कम तक नहीं होता । उसके हो जाने पर प्रेमी को न पीड़ा होती है और न वह प्रेमास्पद के विरह में पुकारता ही है । प्रेम हो जाने पर प्रेमी व प्रेमास्पद कहने को ही दो होते हैं किन्तु तत्त्वतः उनकी सत्ता दो न होकर एक ही होती है । जो प्रेमी दूसरों के सामने प्रेमी होने का दिखावा = प्रदर्शन करते हैं उन्हें माथै मारि = त्याग देना ॥५॥
इति बिरह कौ अंग सम्पूर्ण ॥अंग ३२॥साषी ४९॥
(क्रमशः)

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