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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामी अर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #३५८)*
*राग सूहौ ॥२२॥(गायन समय दिन ९ से १२)*
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*३५८.रंगताल*
*काया माँही सागर सात, काया माँही अविगत नाथ ।*
*काया माँही नदिया नीर, काया माँही गहर गंभीर ॥१॥*
*काया माँही सरवर पाणी, काया माँही बसै बिनाणी ।*
*काया माँही नीर निवान, काया माँही हंस सुजान ॥२॥*
*काया माँही गंग तरंग, काया माँही जमुना संग ।*
*काया माँही है सरस्वती, काया माँही द्वारावती ॥३॥*
*काया माँही काशी स्थान, काया माँही करै स्नान ।*
*काया माँही पूजा पाती, काया माँही तीर्थ जाती ॥४॥*
*काया माँही मुनिवर मेला, काया माँही आप अकेला ।*
*काया माँही जपिये जाप, काया माँही आपै आप ॥५॥*
*काया नगर निधान है, माँही कौतिक होइ ।*
*दादू सद्गुरु संग ले, भूल पड़े जनि कोइ ॥६॥*
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सर्व साधनों में उत्तम इस शरीर में बाह्यजगत् की तरह सात समुद्र हैं । रक्त, मांस, रस, मेद, मज्जा, हड्डी और वीर्यस्वरूप में यह ही समुद्र माने गये हैं । इसी में इन्द्रियातीत परमात्मा विराजता हैं । इसी में बाह्यजगत् की तरह गम्भीर नदियां बहती हैं । रसवहा, उदकवहा, रक्तवहा, शुक्रवहा ये उनके नाम हैं । अथवा भगवान् की भक्तिरूपी नदी का प्रवाह भी इसी शरीर में होता हैं ।
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जैसे लोक में देवर्षियों से सेवित मानसरोवर है वैसे ही इसमें प्रेमरूपी जल से भ्रा हुआ हृदयरूपी मानसरोवर है । जो अति ही पावन हैं । जैसे लोक में नाना ज्ञानसंपन्न लोग देखे जाते हैं । वैसे ही इसमें नाना विषयों के विचार करने में चतुर बुद्धि रहती हैं । इसमें अहंकार दोष रहित ज्ञानजल से परिपूर्ण हृदयरूपी सरोवर हैं जिसमें हंसरूपी महात्मा सदा स्थित रहते हुए आनन्द लेते हैं ।
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इस हृदयरूपी मानसरोवर में इड़ारूपी गंगा और यमुनारूपी पिंगला नाडियों का प्रवाह बहता हैं । इसी शरीर में भक्ति और क्रिया के संगम की तरह ज्ञानस्वरूप सरस्वती नदी सुषुम्ना नाडी की तरह ज्ञानशक्ति को प्रेरित करती हुई बह रही हैं । ज्ञान कर्म उपासना का संगम भी इसी में हो रहा हैं । इसी में सर्व तीर्थों का अलंकार रूपी भगवान् वासुदेव की नगरी द्वारिकापुरी सहस्त्रारचक्र में विद्यमान हैं ।
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भगवान् विश्वनाथ की दिव्यकाशीपूरी जिसका सभी सज्जन सेवन करते हैं । वह ज्ञानरूप से स्थित है । महापुरुष बाह्य स्नान को छोड़कर अन्दर आत्मचिन्तनरुपी स्नान करते हैं । जिस स्नान से मनुष्य सभी अवस्थाओं में बाहर और अन्दर से पवित्र हो जाते हैं ।
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साधु महात्मा केवल बाह्य उपचार से की हुई पूजा, जिससे साधक के मन में महत्वाकांक्षा पैदा होती है कि मैंने इतने बड़े उपचारों से पूजा की हैं । उस बाह्यपूजा को त्यागकर मन में ही भगवान् की मानसपूजा करते हैं । क्योंकि साधन सब जगह पर प्राप्त नहीं होते और जो प्राप्त होते हैं वे सब दूषित ही होते हैं ।
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इस शरीर में जैसे बाहर गया प्रयाग काशी तीर्थ है, वैसे ही शिर, कण्ठ, नाभि, उपस्थ तीर्थ हैं । जैसे तीर्थ मल को नष्ट करके पवित्र बना देते हैं वैसे ही मानस तीर्थ भी मनुष्य को पावन बना देता है । जैसे प्रयागराज में कुंभ मेलों में महात्माओं का सम्मलेन होता हैं । उस प्रकार मानसतीर्थ में भी सद्भावनाओं का समुदाय विराजता है ।
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अर्थात् मननशाली इन्द्रियों की एकाग्रतारूप सम्मलेन हैं । परमात्मा भी सर्वव्यापक होते हुए भी इस शरीर में चेतन रूप से विराजते हैं । इस शरीर में श्वास प्रश्वास की जो चेष्टा हैं उसमें सोऽहं सोऽहं की प्रतिध्वनि होती हैं यह ही अजपा जाप हैं । जैसे बाहर अनेक प्रकार के वैभवों से मुक्त प्रसिद्ध नगर हैं वैसे ही शरीर में भी शमदम षट्सम्पत्ति पूर्ण मनोमयादिकोश ही नगर हैं । उनमें ज्ञानरुपी निधि तथा सौजन्य सौशील्य माधुर्य आदि षड्गुण उनमें रहते हैं । इसमें आश्चर्यमय कर्म होते हैं अतः कोई इसको आश्चर्य की तरह देखते ।
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श्रीदादूजी का यह ही ज्ञान है कि मानव को सब कुछ जानकर सन्मार्ग का ही अब्लंबन करना चाहिये । जो साधक सत्गुरु की संगति करके उनके सहयोग से सन्मार्ग पर चलता हैं वह सकल रहस्य को जान जाता हैं जो सन्मार्ग पर न चलकर अन्यथा आचरण करता है वह विविध आडम्बरों में पड़कर भ्रम के गड्डे में गिर जाता हैं । उसको जीवन में सफलता नहीं मिलती और अन्त में पश्चात्ताप करना पड़ता है ।
नाड़ी नाम नाड़ी स्थल सिद्घि निधि नाम नवधा भक्ति
१. इड़ा देह के बायें भाग अणिमा पद्म श्रवण
२. पिंगला देह में दायें भाग महिमा महापद्म कीर्तन
३. सुषुम्ना बीचले भाग लघिमा शंख स्मरण
४. गांधारी बायें नेत्र प्राप्ति मकर सेवन
५. हस्तिजिह्वा दायें नेत्र प्राकाम्य कच्छप अर्चना
६. पूषा दाहिने कान ईशित्व मुकुन्द वंदना
७. यशस्विनी बायें कान वशित्व कुन्द दास्य
८. अलम्बुषा मुख गरिमा नील सख्य
९. कुहू लिंग वर्च्च: आत्मनिवेदन
१०. शंखिनी गुदा
(क्रमशः)

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