रविवार, 23 जुलाई 2023

*जरणा षिमा पारिष कौ अंग ॥*

 

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
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*जनि खोवै दादू रामधन, हिरदै राखि जनि जाइ ।*
*रतन जतन करि राखिये, चिंतामणि चित लाइ ॥*
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*जरणा षिमा पारिष कौ अंग ॥*
भरिया होइ तौ कदै न डोलै, ग्यानि ध्यानि गुर पूरा ।
बषनां ओछे बासणि पाणी, झलकै सदा अधूरा ॥१॥
बषनांजी कहते हैं, जो बर्तन = घड़ा जल से पूर्ण भरा हुआ होता है, उसका जल छलकता नहीं है । इसके विपरीत जिस घड़े में जल पूर्ण भरा हुआ नहीं होता है वह घड़ा अस्थिर होकर बार-बार छलकता है । इसी प्रकार जो गुरु, संत उपदेशक ज्ञान-ध्यानादि से पूर्ण होता है वह उपदेश देने हेतु इधर-उधर भटकता नहीं फिरता, बक-बक नहीं करता; शिष्य, श्रोता पर प्रभाव जमाने के लिये व्यर्थ प्रयत्न भी नहीं करता; अपने आपको सिद्ध बताने का प्रयत्न भी नहीं करता । इसके विपरीत जो ज्ञान-ध्यान से शून्य होते हैं, वे अपने आपको सिद्ध बताते फिरते हैं और दुनिया को ठककर खाते हैं ॥१॥
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भर्या न फूटै चिणग न छूटै, जरणा कहिये ताहीं ।
बषनौं कहै समाई तिहि मैं, सो बोलि बिगूचै नाहीं ॥२॥
जो घड़ा जल से परिपूर्ण होता है वह अस्थिर न होने के कारण न तो फूटता ही है और न उसमें से जल की चिणग = बूंदे ही गिरती हैं । ठीक इसी प्रकार जो परब्रह्म-परमात्मा के अखंडानंद में सरावोर होता है वह न तो अपने आपको अखंडानंद-मग्न के रूप में दर्शाता है और न वाणी के माध्यम से कहकर ही प्रकट करता है । वस्तुतः जरणा = प्राप्त वस्तु को अपने भीतर ही पचा लेने या प्राप्त तत्त्व को अवसरानवसर पर व्यर्थ ही प्रकट न करने का नाम ही जरणा है । बषनांजी कहते हैं, अखंडानंद स्वरूप परमात्मा के साक्षात्कारी में समाई = प्राप्त वस्तु को पचा लेने की क्षमता होती है । वह कहकर बिगूचै = निंदा का पात्र नहीं बनता । जिनमें करामात होती नहीं किन्तु करामात होने का ढिंढोरा पीटते हैं वे अवसर आने पर करामात नहीं दिखा पाते । परिणामस्वरूप निंदा के पात्र बनते हैं ॥२॥
इति जरणा कौ अंग संपूर्ण ॥अंग ३६॥साषी ५६॥
(क्रमशः)

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