🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*दादू ऊपर देख कर, सबको राखै नांव ।*
*अंतरगति की जे लखैं, तिनकी मैं बलि जांव ॥*
===============
साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
.
*(४)श्रीरामकृष्ण तथा ज्ञानयोग*
.
डाक्टर कह रहे है, ‘ईश्वर ने हमारी सृष्टि की है, और हम सब लोगों की आत्माएँ अनन्त उन्नति करेंगी ।’ वे यह मानने के लिए राजी नहीं कि एक आदमी किसी दूसरे आदमी से बड़ा है । इसीलिए वे अवतार नहीं मानते ।
डाक्टर - अनन्त उन्नति । यह अगर न हो तो पाँच-सात वर्ष और बचकर क्या होगा ? इससे तो मैं गले में रस्सी की फाँसी लगाकर मर जाना बेहतर समझता हूँ !
.
“अवतार फिर है क्या ? जो मनुष्य शौच जाता है - पेशाब करता है, उसके पैरों सिर झुकाऊँ ! हाँ, परन्तु यह मानता हूँ कि मनुष्य में ईश्वर की ज्योति प्रतिबिम्बित होती है ।”
गिरीश (हँसकर) - आपने ईश्वरी ज्योति कभी देखी नहीं –
.
डाक्टर उत्तर देने से पहले कुछ इधर-उधर करने लगे । पास ही एक मित्र बैठे हुए थे - धीरे धीरे उन्होंने कुछ कहा ।
डाक्टर (गिरीश के प्रति) - आपने भी तो प्रतिबिम्ब के सिवा और कुछ नहीं देखा ।
गिरीश - मैं देखता हूँ ! वह ज्योति में देखता हूँ ! श्रीकृष्ण अवतार हैं, यह मैं प्रमाणित कर दूँगा, नहीं तो अपनी जीभ काटकर फेंक दूँगा !
.
श्रीरामकृष्ण - यह सब जो बातचीत हो रही है, कुछ भी नहीं है ।
“यह सब सत्रिपात-ग्रस्त रोगी की बकवाद है । विकार के रोगी ने कहा था, ‘मैं घड़ा भर पानी पिऊँगा, हण्डी भर भात खाऊँगा ।’ वैद्य ने कहा, ‘अच्छा, खाना तब खाना । अच्छे हो जाने के बाद जो कुछ तू कहेगा, वैसा ही किया जायगा ।’
.
“जब घी कच्चा रहता है, तभी तक उसमें कलकलाहट होती है । पक जाने पर फिर आवाज नहीं निकलती । जिसका जैसा मन है, वह ईश्वर को उसी तरह देखता है । मैंने देखा है, बड़े आदमी के घर में रानी की तस्बीर आदि - यह सब है और भक्तों के यहाँ देव-देवियों की तस्वीरें हैं ।
.
“लक्ष्मण ने कहा था, ‘हे राम, वशिष्ठदेव जैसे पुरुष को भी पुत्रों का शोक हो रहा है ।’ राम ने कहा, ‘भाई, जिसमें ज्ञान है उसमें अज्ञान भी है । जिसे उजाले का ज्ञान है, उसे अँधेरे का भी ज्ञान है । इसलिए ज्ञान और अज्ञान से परे हो जाओ ।’ ईश्वर को विशेष रूप से जान लेने पर यह अवस्था प्राप्त हो जाती है । इसे ही विज्ञान कहते हैं ।
.
“पैर में काँटा चुभ जाने से, उसे निकालने के लिए एक और काँटा ले आना पड़ता है । निकालने के बाद फिर दोनों काँटे फेंक दिये जाते हैं । ज्ञानरूपी काँटे से अज्ञानरूपी काँटा निकालकर, ज्ञान और अज्ञानरूपी दोनों काँटे फेंक दिये जाते हैं ।
.
“पूर्ण ज्ञान के कुछ लक्षण हैं । उस समय विचार बन्द हो जाता है । पहले जैसा कहा, कच्चा रहने से ही घी में कलकलाहट रहती है ।”
डाक्टर - पूर्ण ज्ञान रहता कहाँ है ? सब ईश्वर है, तो फिर आप परमहंस का काम क्यों करते हैं ? और ये लोग आकर आपकी सेवा क्यों करते हैं ? आप चुप क्यों नहीं रहते ?
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें