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*पीव सौं खेलूँ प्रेम रस, तो जियरे जक होइ ।*
*दादू पावै सेज सुख, पड़दा नाहीं कोइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
अथ राग वसंत १४(गायन समय प्रभात ३-६ बजे तथा वसंत ॠतु)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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१६८ । धीमा त्रिताल
ॠतु जाय माधव रमि वसंत,
यहु योग जानि घर आओ कंत ॥टेक॥
अवसर अजब अनूप बार, तातें सुन्दरि ठाढी१ करि श्रृंगार ।
अब अबला का राख हु मान, यहु दर्श पियासी देहु दान ॥१॥
सुन्दरि चाहै सेज संग, अन्तर्यामी दे उमंग२ ।
तव३ दर्शन देखैं अघाय९, यहू चरण निकट लीजे लगाय ॥२॥
अतिगति४ आतुर५ इहीं६ भाय७, यहु आयु अल्प रजनी विहाय१० ।
अब नारी का निरख नेहु, विपति जानि हरि दर्श देहु ॥३॥
दया सिंधु दीजे निवास, इस महा पतित की पूरी आश ।
तब तींवी८ शिर होय भाग, जन रज्जब पावै सुहाग ॥४॥३॥
✦ माधव, हमारी आयु रूप वसंत ॠतु जा रही है । स्वामिन ! मेरे हृदय घर में आने का यह सुंदर योग जानकर पधारिये ।
✦ यह मनुष्य शरीर का अवसर अद्भुत है तथा दर्शन अभिलाषा युक्त यह समय अनुपम है । इसलिये मैं साधक सुंदरी साधन रूप श्रृंगार करके दर्शनार्थ खड़ी१ हूं । अब आप मुझ अबला का मान रखिये । मुझे दर्शनों की अभिलाषा है, अत दर्शन रूप दान दीजिये ।
✦ मैं साधक सुंदरी अष्ट दल कमल रूप शय्या पर आपका संग सुख चाहती हूं । अंतर्यामी आप प्रसन्न२ होकर दर्शन दें । आपका३ दर्शन करते ही मैं तृप्त९ हो जाऊँगी । यह जानकर आप मुझे अपने चरणों के पास रख लीजिये ।
✦ इस६ दर्शन की भावना७ से मैं अत्यधिक४ व्याकुल५ हूं । मेरी आयुरूप रात्रि बहुत थोड़ी रही है और यह भी जा१० रही है । अब हे हरे ! आप मुझ साधक सुंदरी का प्रेम देखकर तथा मेरी विपति को जानकर मुझे दर्शन दें ।
✦ दया के समुद्र प्रभो ! आपके चरण कमलों में निवास दीजिये । इस महापतित की आशा पूर्ण कीजिये । मुझ नारी८ का भाग्योदय तब ही होगा, जब मुझे आपके दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त होगा ।
(क्रमशः)

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