गुरुवार, 6 जुलाई 2023

*१४. कृष्णदास पंडित जी*

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*साधु शब्द सुख वर्षहि, शीतल होइ शरीर ।*
*दादू अन्तर आत्मा, पीवे हरि जल नीर ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*१४. कृष्णदास पंडित जी*
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*गोविन्द देव स्वरूप शिरोमणि,*
*पंडित कृष्ण सु दास प्रमानौ ।*
*सेवन से अनुराग सु अंगनि,*
*पाग रही मति है मन जानौ ।*
*प्रीति करै हरि भक्तन से बहु दे,*
*सु प्रसाद सु पद्धति मानौ ।*
*रीति स्वतै सु प्रतीति बिनीत हु,*
*चाल चलै वहि और न आनो ॥३५२॥*
श्रीगोविन्द देव जी के स्वरूप के पंडित कृष्णदास जी शिरोमणि सेवक थे- ऐसा प्रमाणित होता है ।
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सेवा करने योग्य प्रभु के अंग हैं, उन सब में आपकी बुद्धि और मन अनुराग पूर्वक लग रहे थे । ऐसा ही जानना चाहिये ।
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पंडित जी हरिभक्तों से बहुत प्रीति करते थे और संतों को श्रीगोविन्ददेव जी का विविध प्रकार का प्रसाद अच्छी प्रकार देते थे और हृदय से लगा लेते थे । यही इनको सुन्दर पद्धति थी, ऐसा ही मानना चाहिये ।
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प्रेमी पंडित कृष्णदास जी हरि और हरि भक्तों से सहज रीति से ही विनीत होकर प्रीति प्रतीति रखते थे और बड़ों की जो पद्धति रूप चाल थी, उसी पद्धति रूप चाल से आप चलते थे अर्थात् उपासना करते थे । अन्य दूसरी पद्धति आपने नहीं अपनाई थी ।
(क्रमशः)

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