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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Ram Gopal Das बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*३७. निगुणां कौ अंग १७/२०*
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कुबचन कांजी दूध मन, मूरख फाड़ै बाहि ।
कहि जगजीवन रांमजी, सतगुरु बरजौ१ ताहि ॥१७॥
(१. बरजौ=निषेध करो)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि मूरख कांजी की भांति है जिसकी बूंद के पड़ने से दूध फट जाता हैजो मन जैसा है । वे किसी के भी मन को दुखा देते हैं । हे, सद्गुरु महाराज आप ही उनको रोक सकते हैं ।
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कुबचन कांजी दूध मन, परसत प्रांण बिनास ।
रांम क्रिपा थैं बांचिये, सु कहि जगजीवनदास ॥१८॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि बुरे वचन कांजी जैसे हैं और मन दूध जैसा है जो सम्पर्क में आते ही विनाश को प्राप्त होता है । हे प्रभु आप की कृपा से ही बच सकते हैं ऐसा संत कहते हैं ।
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हंस काग एकै भवन२, केई दिन कियौ निवास ।
पीछे बिरचै३ न्याइ गए४, सु कहि जगजीवनदास ॥१९॥
(२. भवन=स्थान) (३. बिरचै=पृथक् हो) (४. नयाइ गये=दूर हो गये)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हंस अर्थात सज्जन जन व काग, दुष्टजन दोनों संसार रुपी भवन में रह कर अपने अपने कर्मों के हिसाब से पृथक गति को प्राप्त हुये ऐसा संत कहते हैं ।
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दारोग५ भाखौ दोजगी६, मांहि भिस्ति७ की आस ।
जाग जुगति काजी ठग्यौ, सु कहि जगजीवनदास ॥२०॥
(५. दारोग=असत्य) (६. दोजगी=पापी) {७. भिस्ति=बहिस्त(स्वर्ग)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि असत्य भाषी नर्कगामी होता है । और वह स्वर्ग की आशा करता है हे जीव संभल जा धर्म गुरु काजी तुम्हें माया के चक्कर में डाल ठग रहे हैं ।
(क्रमशः)

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