मंगलवार, 4 जुलाई 2023

*१३. कृष्णदास ब्रह्मचारी*

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*दादू आनंद सदा अडोल सौं, राम सनेही साध ।*
*प्रेमी प्रीतम को मिले, यहु सुख अगम अगाध ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*१३. कृष्णदास ब्रह्मचारी*
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*मोहन काम स्वरूप सनातन,*
*शीश धरे भल पूजन कीजे ।*
*कृष्ण सु दास मनुं ब्रह्म चारिहु,*
*भट्ट नारायण शिष्य जु भीजे१ ॥*
*चारु सिंगार करै हु निहारत,*
*चेत२ रहै नहिं यूँ मन दीजे ।*
*राग रु भोग बखान करूं किमि,*
*है अज हूं उन देख रु जीजे ॥३५१॥*
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कृष्णदासजी ब्रह्मचारी सनातन जी के शिष्य थे । सनातन ने इनको सुयोग्य, प्रेमी, तथा सुपात्र जानकर 'श्रीमदन मोहन' के स्वरूप विग्रह की सेवा-पूजा का भार इनके शिर पर घर कर कहा था- 'प्रभु की सेवा-पूजा भली भाँति करो ।'
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तब कृष्ण दास ब्रह्मचारी गुरु सनातन जी की आज्ञा मानकर सेवा पूजा करने लगे । कुछ काल पश्चात् नारायण भट्ट कृष्णदास ब्रह्मचारी के शिष्य हो गये तब ब्रह्मचारी जी ने उनको सेवा-पूजा का पात्र जानकर सेवा-पूजा सौंप दी ।
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नारायण भट्ट प्रभु प्रेम में निमग्न१ रहते थे । उनकी प्रेमा भक्ति प्रभु को प्रसन्न करने योग्य ही थी । सुन्दर श्रृंगार कर के प्रभु की छवि को इकटक देखते देखते आपकी प्रेम समाधि लग जाती थी । आपको कुछ भी ज्ञान२ नहीं रहता था । इस प्रकार प्रभु में मन लगाते थे ।
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उनके राग और भोग का कथन कैसे करूँ, किया ही नहीं जाता । आपके प्रेम से लड़ाये हुए श्रीमदनमोहन जी अब तक विराजमान हैं, जिनके दर्शन से जीव अपना जीवन सफल करके जीवित रहते हैं ।
(क्रमशः)

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