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*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Ram Gopal Das बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*३७. निगुणां कौ अंग १३/१६*
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मूरख नर समझै नहीं, महा अघौरी अन्ध ।
हरि जन पीवै प्रेम रस, जगजीवन कहै धन्ध ॥१३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि मूर्ख व्यक्ति महान जिद्दी हो अंधे की भांति कुछ समझते ही नहीं हैं जो भक्त जन भक्ति का आनंद रसास्वादन कर रहे हैं उन्हें वे कहते हैं कि न जाने कौन से धन्धे में पड़े हैं ।
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जग जाग्रित जड़ रांम दिसी, सींग कुमति के सीस७ ।
कहि जगजीवन बंझ बिन, झांकै कूदै कीस८ ॥१४॥
(७. सीस=सिर पर) (८. कीस=बानर)
संतजगजीवन जी कहते है कि संसार स्वयं को जाग्रत कह राम भक्तों को जड़ या मूर्ख कहते हैं । पर मूर्खों की अलग कोइ पहचान नहीं होती है जैसे की सिरपर सींग होना । वे अपनी बानर जैसी बिना प्रयोजन की उछल कूद या प्रयास से ही पहचानने में आजाते हैं ।
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विद्या मांही अविद्या, तुलसी मांही भांग ।
कहि जगजीवन करि मसलह, मुल्लां दीनी बांग ॥१५॥
संतजगजीवन जी कहते है कि मूढमति जन अविद्या को ही विद्या मानते हैं वे तुलसी को भी भांग जैसे हाथ में मसल कल खैनी कीतलह खाकर फिर अजान देते है ।
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मूरख जरठ९ अग्यांन का, वपु१० जैसा बंबूल११ ।
कहि जगजीवन रांमजी, सबद एहि भई सूल१२ ॥१६॥
(९. जरठ=वृद्ध) (१०. वपु=शरीर) (११. बंबूल=एक कांटेदार वृक्ष) (१२. सूल=कांटा)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि मूरख अपनी मूर्खता में ही वृद्ध हो जाते है । उनकी देह बबूल वृक्ष सी होती है जिसके आभास शब्द कांटो जैसी चुभन देते हैं उनकी वाणी पीड़ा दायक होती है ।
(क्रमशः)

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