शुक्रवार, 28 जुलाई 2023

*श्री रज्जबवाणी पद ~ १७८*

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*हरि चिन्तामणि चिन्ततां, चिंता चित की जाइ ।*
*चिंतामणि चित में मिल्या, तहँ दादू रह्या लुभाइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग कान्हड़ा १५ (गायन समय रात्रि १२ से ३)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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१७८ दादरा
मन मित्त१ चिंत२ कीजे,
अगम रूप तत्त्व अनूप, गोविन्द भजन लीजे ॥टेक॥
जन्म जाय करि उपाय, छिन छिन छिन छीजे ।
यहु विचार सुमिर सार, अमृत रस पीजे ॥१॥
सुनहु किन तज हु आन३, शीश ईश दीजे ।
रज्जब शूर हरि हजूर४, जुग जुग जुग जीजे ॥२॥९॥
✦ अरे मित्र ! मन ! चिन्ता रखकर, अगम स्वरूप अनुपम तत्त्व गोविन्द का भजन करले । तेरा यह मानव जन्म व्यर्थ जा रहा है, कल्याण का साधन कर ।
✦ तेरी आयु प्रति क्षण क्षीण हो रही है, यह विचार करके विश्व के सार रूप प्रभु का स्मरण करते हुये भजनान्द रूप अमृत रस का पान कर ।
✦ यह मेरी बात कान लगा कर सुन और अन्य३ सब को छोड़कर अपना अहंकार रूप शिर ईश्वर को समर्पण कर दे । इस प्रकार शूरवीर होकर हरि के पास उपस्थित४ होगा तो ब्रह्म रूप होकर प्रति युग में जीवित रहेगा ।
(क्रमशः)

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