शनिवार, 22 जुलाई 2023

*३८. सज्जन दुरजन कौ अंग ५/७*

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*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*३८. सज्जन दुरजन कौ अंग ५/७*
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सजन साख सुफल फली, नइ आई६ सब ठांम ।
कहि जगजीवन बंस व्रिति विषै, अति ऊँचौ किहीं कांम ॥५॥
(६. नइ आई=झुक गयी)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सज्जन तो सदा फलों से लदी शाखा के समान हैं जो झुक जाते हैं व दुष्ट जन बांस जैसे हैं जो बढते हैं तो पहुंच से परे हो जाते हैं ।
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सजन सुधा रस सों भरे, सुफल फलैं निवास ।
दुरजन दार७ खलि८ गिरि गये, सु कहि जगजीवनदास ॥६॥
(७. दार=वृक्ष) (८.खल=दुष्ट)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सज्जन व्यक्ति आनंद रस से भरे रहते हैं । जहां भी रहते हैं अच्छे परिणाम फलित होते हैं । दुष्ट गिरने वाले वृक्षों जैसे है जो मूर्खता से पतन को ही प्राप्त होते हैं ।
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कही जगजीवन कुकरमी९, जीव कुबुद्धि१० कांम ।
रसानां हरि हरि नां रटत, ह्रिदै न राखै रांम ॥७॥
(९. कुकरमी=पाप कर्म करने वाले) (१०. कुबुद्धि=दुष्ट बुद्धि)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो कुकर्मी जीव हैं वे कुबुद्धि से ही काम लेते हैं । वे जिह्वा से स्मरण नहीं करते न ही मन में राम रखते हैं ।
(क्रमशः)

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