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*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Ram Gopal Das बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*३८. सज्जन दुरजन कौ अंग १/४*
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पात छांह खल मित्र ई, ता सनि मन न पतयाइ ।
जगजीवन दीरघ पहल, (पीछै) घटत घटत घटि जाइ ॥१॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि बादशाह अर्थात राजा व मूर्ख मित्र इनसे कभी मन की बात न करें । ये पहले तो उदार रहते हैं पर धीरे धीरे ये कम हो जाते हैं निभा नहीं पाते ।
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जैसी छाया भोर१ की, अैसी खसम२ की प्रीति ।
जगजीवन सहजैं टली, साधन३ उलटी रीति ॥२॥
(१. भोर=प्रातःकाल) (२. खसम=उपपति, जार) (३.साधन=सज्जनों की) (छायेव मैत्री खलसज्जनानाम् ) ।
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जैसे प्रातःकाल की परछाई होती है जो सूर्य के उदय के साथ ही धूप में बदल जाती है वैसे ही संसारिक पति का स्नेह होता है । किंतु साधु जन की मैत्री इससे विपरीत होती है वे हर परिस्थिति में निभाते अवश्य हैं ।
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परछांई की छांहड़ी४, संक्या होत न बार५ ।
कहि जगजीवन हरि बिनु यहु तन, समझत नहीं गंवार ॥३॥
(४. परछांई की छाहंडी=छाया का प्रतिबिम्ब) (५. संक्या होत न बार=नष्ट होते देर नहीं लगती)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि यह देह प्रभु बिना परछाईं की छाया जैसी है जो शीघ्र ही नष्ट हो जाता है । प्रभु के बिना यह देह कुछ भी नहीं है मूर्ख जीव यह बात क्यों नहीं समझता है ।
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सजन मिलै आसीस द्यौ, दुरजन द्यो दुरसीस ।
कहि जगजीवन हरिजन राखै, हरि मंहि तेरह बीस ॥४॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सज्जन मिलते हैं तो उनका आचरण आशीष देता है व दुष्टों का दुराशीश देता है । वे सद्भावी नहीं होते हैं । जो जैसा होता हे प्रभु उसे वैसा ही रखते हैं ।
(क्रमशः)

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