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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
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*राम विरहनी ह्वै रह्या, विरहनी ह्वै गई राम ।*
*दादू विरहा बापुरा, ऐसे कर गया काम ॥*
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*परचा कौ अंग ॥*
दूध मिल्यौ ज्यूँ नीर मैं, जल मिसरी इक रूप ।
सेवग स्वामी नाँव द्वै, बषनां येक सरूप ॥१॥
स्वात्मतत्त्व के बोधानन्तर साधक और स्वात्मतत्त्व स्वरूपी परब्रह्म परमात्मा कहने मात्र को दो रह जाते हैं, वस्तुतः वे एक ही हो जाते हैं । जैसे दूध में पानी मिलकर तथा जल में मिश्री मिल कर एकाकार हो जाते हैं । उनका कोई पृथक्-पृथक् स्वतंत्र अस्तित्व नहीं रहता ॥
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यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि संतों द्वारा पहले भेद और बाद में अभेद माना गया है । यदि संत प्रारम्भ से ही अभेद मानते होते तो उनके द्वारा भक्ति को स्वीकार करना संभव न होता ।
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संतों द्वारा गृहीत भक्ति की पहली शर्त ही यह है की साधक अपना पृथक् अस्तित्व मानते हुए परमात्मा की स्मरण रूपी भक्ति करता है । “स्वात्मतत्त्वानुसंधानं केचित् भक्तिरुच्यते ।” विवेक चूड़ामणि ॥ जिस प्रकार लट भँवरे की भूँ भूँ सुनकर भ्रमर हो जाती है, ऐसे ही राम नाम स्मरण करने वाला निर्गुणी संत साधक राम-राम करते-करते राम रूप हो जाता है ।
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अतः सिद्धान्ततः यही बात प्रकट होती है कि पहले भेद तथा पश्चात् अभेद सिद्धांत को ही संतों ने माना है ॥१॥
दादूजी की साषी से भी यही सिद्ध होता है “राम बिरहनी हो गई, बिरहनी हो गया राम ।” ॥१॥
इति परचा कौ अंग संपूर्ण ॥अंग ३५॥साषी ५४॥
(क्रमशः)

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