बुधवार, 5 जुलाई 2023

शब्दस्कन्ध ~ पद #३५०

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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #३५०)*
*राग विलावल ॥२१॥(गायन समय प्रातः ६ से ९)*
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*३५०. परिचय । एक ताल*
*ये मन मेरा पीव सौं, औरनि सौं नाँहीं हीं ।*
*पीव बिन पलहि न जीव सौं, यह उपजै मांहीं ॥टेक॥*
*देख देख सुख जीव सौं, तहँ धूप न छाहीं ।*
*अजरावर मन बंधिया, तातैं अनत न जाहीं ॥१॥*
*तेज पुंज फल पाइया, तहाँ रस खाहीं ।*
*अमर बेलि अमृत झरै, पीव पीव अघाहीं ॥२॥*
*प्राणपति तहँ पाइया, जहँ उलट समाई ।*
*दादू पीव परचा भया, हियरे हित लाई ॥३॥*
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मेरा मन तो अपने प्यारे प्रभु के चिन्तन से ही प्रसन्न होता है अन्य के चिन्तन से नहीं । मेरे अत्यन्त प्यारे प्रभु के चिन्तन बिना तो एक क्षण भर भी नहीं जी सकता हूँ । ऐसी भावना मेरे अन्तःकरण में पैदा होती रहता है ।
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मेरा मन तो देवताओं से भी अतिश्रेष्ठ परब्रह्म परमात्मा के स्वरूप में आसक्त हुआ अन्यत्र जाना ही नहीं चाहता । जहां निर्विकल्प समाधि में ज्ञान अज्ञानवृत्ति रूप छायाधूप भी नहीं होते उस समाधि में अपने प्रभु को देख देखकर सुख से जीना चाहता हूँ । यही मेरे मन की भावना है ।
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मेरे मन ने तो सब साधनों का जो तेजोमय ब्रह्म का दर्शनरूप फल है उसको प्राप्त करके सहजावस्था में ब्रह्मानन्द रस का पान करता है । आत्मस्वरूप अमृतलता के साक्षात्कार स एंतःकरण में मेरे आनन्दामृत की धारा बहती है । उस आनन्दामृत धारा के आनन्द जल को मन की वृत्ति के द्वारा पान अक्र्के तृप्त हूँ ।
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जहां पर विषयों से हटकर मन की वृत्ति लीन हो जाती है । उसी स्थान पर प्रभु की प्राप्ति होती है । मैंने तो उस प्रभु को प्राप्त कर लिया है । उसका साक्षात्कार करके विशेष रूप से हृदय में स्थित जो प्रभु है उनके प्रेम में डूबा हुआ हूँ । अर्थात् सच्चिदानन्द में स्थित हूँ ।
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अष्टवक्रगीता में कहा है कि –
जो पुरुष शरीर इन्द्रिय आदि से भिन्न तथा उनके साक्षी विज्ञान स्वरूप स्वयं प्रकाश परमतत्व अपने आत्मा को जान लेता है वह अतिवर्णाश्रमी कहलाता है । अतः मैं वर्णाश्रमी से अतीत सबका साक्षीचिद्रूप हूँ ।
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शिवानन्दलहरी में कहा है कि –
जिसका अन्तःकरण सदा शिवभगवान् के चरणकमलों में रमण करता है वह परमयोगी और सदा सुखी है चाहे वह गुफा में रहे या घर में बाहर कहीं वन में या पर्वत की शिखा पर जल में या अग्नि के पास रहे । इससे उसके जीवन में कोई लाभ नहीं क्योंकि इनका जो फल भक्ति है वह उसको पहले ही प्राप्त हैं ।
(क्रमशः)

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