शुक्रवार, 7 जुलाई 2023

*श्री रज्जबवाणी पद ~ १६९*

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*साहिब मुख बोलै नहीं, सेवक फिरै उदास ।*
*यहु बेदन जिय में रहै, दुखिया दादू दास ॥*
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
अथ राग वसंत १४(गायन समय प्रभात ३-६ बजे तथा वसंत ॠतु)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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१६९ करुणा । कहरवा
सखी सुख सेज न चाहडीरे१, 
सु देही दुख दर२ माहडीरे३ ॥टेक॥
न देवै प्रेम पियालारे, कहावे दीन दयाला रे,
करे किम४ येतला५ टालारे६ ॥१॥
न देवै अंग अनयानीरे७, सु तेहना८ जीवनी जानी रे । 
सु सहुवै९ दु:ख विहानीरे१० ॥२॥
कहूं केन्हैं११ दुखनी१२ बातें रे, राखै सेंण१३ संगातैंरे१४ । 
सु रज्जब वारणे१५ जातैंरे१६ ॥३॥४॥
प्रभु वियोग जन्य दु:ख बता रहे हैं - 
✦ संत सखि ! प्रभु ने अपनी सहजावस्था रूप शय्या पर मुझे नहीं चढाया१ है । इस कारण मेरा शरीर दु:ख रूप गढ़े२ में३ ही पड़ा है । 
✦ वे कहलाते तो दीन दयालु हैं किंतु मुझे प्रेम प्याला नहीं दे रहे हैं । पता नहीं मुझसे इतने५ क्यों४ टल६ रहे हैं । 
✦ मैं नहीं७ जानती कि - वे मुझे अपना अंग संग क्यों नहीं देते हैं ? किंतु मैंने तो उन्हीं को अपना जीवन जाना है और उनके बिना१० दु:ख सहन कर रही हूँ । 
✦ मैं अपने दु:ख१२ की बातें किससे११ कहूं ? मेरा सज्जन१३ मुझे साथ१४ रक्खे तब मेरा दु:ख दूर हो सकता है । हे प्रभो मैं आपकी बलिहारी१५ जाती१६ हूं । मुझ पर कृपा करें । 
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित वसंत राग १४ समाप्तः । 
(क्रमशः)

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