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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #३५१)*
*राग विलावल ॥२१॥(गायन समय प्रातः ६ से ९)*
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*३५१. त्रिताल*
*आज प्रभात मिले हरि लाल ।*
*दिल की व्यथा पीड़ सब भागी,*
*मिट्यो जीव को साल ॥टेक॥*
*देखत नैन संतोष भयो है,*
*इहै तुम्हारो ख्याल ॥१॥*
*दादू जन सौं हिल-मिल रहिबो,*
*तुम हो दीन दयाल ॥२॥*
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श्रीमद्भागवत में कहा है कि –
अहो ! आज ही मेरा प्रियतम हरि प्रातःकाल में(बाल्यावस्था में मिल गये) जिससे मेरी वियोगजन्य व्यथा मिट गई और इस जीव के जन्म मरण आदि दुःख भी समाप्त हो गये । उनके दर्शनों से नेत्रों को भी परमानन्द की प्राप्ति हो गई । हे प्रभो ! अब मेरा मन आपका ही हृदय से ध्यान करे । मैं तो आपका भक्त हूँ । अतः आपका और मेरा घनिष्ट प्रेम हो जाय ऐसी कृपा कीजिये क्योंकि आप तो दयालु हैं ।
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श्रीमद्भागवत में कहा है कि –
भगवान् के चरणचिन्हों का दर्शन करते ही अक्रूरजी के हृदय में इतना आनन्द हुआ कि वे अपने को संभाल नहीं सके । विह्वल हो गये । प्रेम के आवेग में उनका रोम रोम खिल उठा । नेत्रों में अश्रु बह चले और रथ से कूदकर धूल में लेटने लगे और कहने लगे कि यह मेरे प्यारे कृष्ण के चरणों की रज है । ऐसा कहकर उसमें लेटने लगे ।
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न तो उन्हें कोई प्रिय है न अप्रिय, न उनका कोई आत्मीय सुहृद हैं और न कोई शत्रु । उनकी उपेक्षा का भी कोई पात्र नहीं फिर भी जैसे कल्पवृक्ष मांगने वाले को मुंहमांगी वस्तु देता है वैसे ही भगवान् श्रीकृष्ण भी उन्हें जो जिस प्रकार भजता है उसे उसीरूप में भजते हैं । वे अपने प्रेमी भक्तों से ही प्रेम करते हैं ।
(क्रमशः)

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