शुक्रवार, 7 जुलाई 2023

महावतनारायण

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*कै यहु तुम को सेवक भावै,*
*कै यहु रचले खेल दिखावै ॥३॥*
*कै यहु तुम को खेल पियारा,*
*कै यहु भावै कीन्ह पसारा ॥४॥*
*यहु सब दादू अकथ कहानी,*
*कहि समझावो सारंग-पाणी ॥५॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. २३४)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - पानी स्थिर रहने पर भी पानी है, और तरंग-रूप से हिलने-डुलने पर भी वह पानी ही है ।
“एक बात और । महावत-नारायण की बात भी क्यों न मानी जाय ? गुरु ने शिष्य को समझाया था कि सब नारायण हैं । पागल हाथी आ रहा था, शिष्य गुरु की बात पर विश्वास करके वहाँ से नहीं हटा । यही सोचकर कि हाथी भी नारायण है !
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महावत इधर चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा था, ‘सब लोग हट जाओ - रास्ते से सब हट जाओ ।’ पर शिष्य नहीं हटा । हाथी आया और उसे एक ओर फेंककर चला गया । शिष्य को बड़ी चोट लगी, केवल जान ही नहीं निकली । मुँह पर पानी के छींटे लगाने से उसे चेत हुआ ।
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जब उससे पूछा गया कि तुम हटे क्यों नहीं, तब उसने कहा, ‘क्यों, गुरु महाराज ने तो कहा था सब नारायण हैं ।’ गुरु ने कहा, ‘बेटा, अगर ऐसा ही था तो तुमने महावत नारायण की बात क्यों नहीं मानी ? महावत भी तो नारायण हुआ ।’
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वे ही शुद्ध मन और शुद्ध बुद्धि होकर भीतर वास करते हैं । मैं यन्त्र हूँ, वे यन्त्री हैं । मैं घर है, वे मालिक वे ही महावतनारायण हैं ।”
डाक्टर - और एक बात कहूँगा, आप फिर ऐसा क्यों कहते हैं कि रोग अच्छा कर दो ?
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श्रीरामकृष्ण - जब तक ‘मैं’ रूपी घट है, तभी तक ऐसा हो रहा है । सोचो, एक महासमुद्र है, ऊपर-नीचे जल से पूर्ण है । उसके भीतर एक घट है । घर के भीतर बाहर पानी है; परन्तु उसे बिना फोड़े यथार्थ में एकाकार नहीं होता । उन्हीं ने इस ‘मैं’ – घट को रख छोड़ा है ।
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डाक्टर - तो यह ‘मैं’ जो आप कह रहे हैं, यह सब क्या है ? इसका भी तो अर्थ कहना होगा । क्या वे (ईश्वर) हमारे साथ कोई मजाक कर रहे हैं ?
गिरीश - (डाक्टर से) - महाशय, आपको कैसे मालूम हुआ कि वह मजाक नहीं है ?
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - इस ‘मैं’ को उन्हीं ने रख छोड़ा है । उनकी क्रीड़ा – उनकी लीला !
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“एक राजा के चार लड़के थे । सब थे तो राजा के लड़के, परन्तु उन्हीं में कोई मन्त्री, कोई कोतवाल, इसी तरह बन-बनकर खेल रहे थे । राजा के लड़के होकर कोतवाल का खेल !
(डाक्टर से) “सुनो, यदि तुम्हें आत्म-साक्षात्कार हो जाय तो यह सब तुम मानने लग जाओगे । उनके दर्शन से सब संशय दूर हो जाते हैं ।
डाक्टर - सब सन्देह कहाँ जाता है ?
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श्रीरामकृष्ण- मेरे पास इतना ही सुन जाओ । इससे अधिक कुछ जानना चाहो तो अकेले में उनसे (ईश्वर से) कहना । उनसे पूछना, क्यों उन्होंने ऐसा किया है ।
“लड़का भिक्षुक को मुट्ठी भर चावल ही दे सकता है । अगर रेल के किराये की उसे आवश्यकता होती है, तो यह बात मालिक के कान तक पहुँचायी जाती है ।”
डाक्टर चुप हैं ।
(क्रमशः)

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