शुक्रवार, 7 जुलाई 2023

*कुणका बीणत क्यौं फिरै*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
*दादू जिन कंकर पत्थर सेविया,*
*सो अपना मूल गँवाइ ।*
*अलख देव अंतर बसै, क्या दूजी जगह जाइ ॥*
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कुणका बीणत क्यौं फिरै, पूरी रासि बिठाइ ।
कहि बषनां तिहि दास कौन, कबहूँ काल न खाइ ॥१३॥
कुणका = कणका(अन्न के कण) = छोटे-मोटे सुखों को प्राप्त करने के लिए क्यों प्रयत्न करते फिरते हो । अरे ! पूरी रासि = सम्पूर्ण अन्न के ढेर अखंडानंद स्वरूप परब्रह्म-परमात्मा जो तेरे निकट = तुझ में ही है को प्राप्त करने का प्रयत्न कर । बषनां कहता है, जो अखंडानंद स्वरूप परब्रह्म-परमात्मा को प्राप्त करने का प्रयत्न करते-करते उसे प्राप्त कर लेते हैं उन्हें काल कभी भी अपना ग्रास नहीं बना पाता ॥१३॥
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सब आया उस एक मैं, दही मही घ्रत दूध ।
बषनां बाकी क्या रह्या, जब दुहि पाया दूध ॥१४॥
बषनांजी कहते हैं, जब गाय अथवा भैंस को दुहकर दूध प्राप्त कर लिया जाता है तब दही, छाछ, घृत तथा दूध प्राप्त करने में से क्या शेष रह जाता है क्योंकि ये चारों ही पदार्थ उस एक दूध के ही नामांतर हैं = दूध में ही समाये हुए हैं ॥१४॥
इति सुमिरण कौ अंग सम्पूर्ण ॥अंग २९॥साषी ४४॥
(क्रमशः)

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