बुधवार, 22 मई 2024

*४३. गूढ़ अर्थ कौ अंग ७७/८०*

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*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Ram Gopal Das बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*४३. गूढ़ अर्थ कौ अंग ७७/८०*
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सी जाड़ौ ता तेज हरि, पति परमेसुर रांम ।
कहि जगजीवन अधर धर्या मंहि, अगणित अबिगत नांम ॥७७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जैसी प्रभु की कृपा जैसा तेज, तेज अनुरूप ही कृपा करते हैं । वे मालिक हैं और इस पृथ्वी पर उनके अगणित नाम हैं ।
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जा को लाड़ो१ त्रिया को, रैणि बिराजै आइ ।
कहि जगजीवन रांमजी, रीति सुभाइ मिलि जाइ ॥७८॥
{१. लाड़ो=अनुराग(स्नेह)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जिनका अनुराग स्त्री में है वे उसे ही भजते हैं व संत रात्रि में एकांत पा भजन मैं तल्लीन होते हैं जहाँ जिसका स्नेह व स्वभाव होता है वह वैसा ही आचरण करता है ।
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सी हरि शरणै रांम के, आलौ अनहद बास ।
उनमन ताली एक रस, सुकहि जगजीवनदास ॥७९॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जैसे राम की शरण है, उसमें उत्तम अनहद धुन है । जो प्रभु के लिये व्याकुल है उसे ही प्रभु की धुन व सुगंध या महिमा का अनुभव होता है ।
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ॐ हरि अबिगत रांमजी, न हालौ नूर निवास ।
प्यावौ पीवौ प्रेम रस, सु कहि जगजीवनदास ॥८०॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि औंकार में प्रभु है औंकार ही प्रभु हैं । उनका कोइ पृथक तेज नहीं है । इस आनंद का पान करो भी व अन्यजन को भी करवायें ।
(क्रमशः)

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