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*सब ही मृतक देखिये, क्यों कर जीवैं सोइ ।*
*दादू साधु प्रेम रस, आणि पिलावे कोइ ॥*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*चतुर्भुज जी की पद्य टीका*
*इन्दव-*
*गौंड हु देश भगत्ति नहीं अणु,*
*मानुष मारि रु मात चढ़ावै ।*
*जाय तहां उन मंत्र सुनावत,*
*दे सपनों सब गांव जगावै ॥*
*धाय करो तुम चतुरभुजै गुरु,*
*ना करि हो मरि हो पुर आवै ।*
*शिष्य किये धरि स्वांग जिये उन,*
*पाव लिये बहुतै सुख पावै ॥४०३॥*
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नर्मदा तट के गौंड़वान देश में भगवद्भक्ति लेश मात्र भी नहीं थी । वहाँ के लोग मनुष्य को मार कर अपने इष्ट देवता कालिका के चढ़ाते थे ।
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वहाँ जाकर उस देवता के कान में आपने भगवत् मंत्र सुनाया । देवता ने श्रद्धापूर्वक मंत्र ग्रहण करके उस ग्राम के सब लोगों को स्वप्न में शिक्षा देकर सचेत करते हुए कहा- "तुम सब शीघ्र जाकर स्वामी चतुर्भुजजी को गुरु बना के भगवद्भक्ति करो ।
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ऐसा नहीं करोगे तो सब का नाश हो जायगा ।" यह सुनकर संपूर्ण ग्राम के लोग चतुर्भुजजी के पास आये ।
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आपने सबको शिष्य करके फिर उनको माला तिलकादि भक्त भेष प्रदान किया । उसको धारण करके निर्विघ्न जीवन धारण पूर्वक चतुर्भुज के चरणों को स्पर्श कर उन्हें प्रणाम किया । फिर भगवद्भक्ति में मन लगा कर अत्यन्त सुख को प्राप्त हुये ।
(क्रमशः)

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