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*दादू काँधे सबल के, निर्वाहेगा और ।*
*आसन अपने ले चल्या, दादू निश्चल ठौर ॥*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*चतुर्भुज जी*
*छप्पय-*
*हुओ हरिवंश प्रताप तैं, चहुँ दिशि प्रकट सु चतुर्भुज ॥*
*भिन भिन भक्ति प्रताप, भक्त वत्सल यश गायो ।*
*क्षीर रु नीर निखार१, सुगम करि सब को पायो ।*
*अनन्य धर्म के कवित, ऐंन२ अमृत के प्याले ।*
*मुरलीधर की छाप, छिपे नहिं सर्वत्र चाले ॥*
*जन राघव बल भजन के, गौंड देश कियो धर्म धुज ।*
*हुआ हरिवंश प्रताप तैं, चहुँ दिशि प्रकट सु चतुर्भुज ॥२९१॥*
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अपने गुरुदेव हरिवंशजी के प्रताप से चतुर्भुजजी चारों दिशाओं में प्रकट हो गये हैं । चतुर्भुजजी ने भिन्न-भिन्न भक्ति अर्थात् नौ प्रकार की नवधा, प्रेमा और परा भक्ति का प्रताप तथा भगवान् के भक्तवत्सलता रूप यश का गान किया है ।
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जैसे हंस दूध और जल को अलग१ अलग कर देता है, वैसे ही सत्य और असत्य को अलग-अलग करके आपने सत्य स्वरूप परमात्मा को भक्ति का मार्ग सुगम बताकर सबको भक्ति-रस का पान कराया था ।
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आपके रचित अनन्य भक्ति रूप धर्म के संबन्धी कवित्त ऐसे प्रतीत होते हैं मानो साक्षात्२ अमृत के प्याले ही हैं । आप अपनी कविता में मुरलीधर की छाप लगाया करते थे । आप की रचना कहीं भी छिपी नहीं रहती थी, सर्वत्र चलती थी अर्थात् सब लोग पढ़ते-सुनते थे ।
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राघवदासजी कहते हैं आपने नर्मदा तट के गौंड देश को भजन के बल से धर्मध्वज युक्त किया था अर्थात् उस देश में धर्म की ध्वजा फहराई थी । आपकी कविता का नमूना भी देखिये-
छप्पय-
"श्वपच पहर यज्ञोपवीत, कर कुशनि गहत जब ।
कर्म करै अघ परै डरै पुनि विश्व त्रास तव ॥
पुनि ललाट पट तिलक, देय तुलसी माला धरि ।
हरि के गुन उच्चरै, पाप कुल कर्म हि परिहरि ।
चतुर्भुज पुनीत अन्त्यज भयो, मुरलीधर शरनो लियो ।
तिहि पाछे किन लागिये, जिन लोह पलट कंचन कियो" ॥
(क्रमशः)

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