सोमवार, 13 मई 2024

*रूप मनोहर आप निहारै*

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*दादू भोजन दीजे देह को, लिया मन विश्राम ।*
*साधु के मुख मेलिये, पाया आतमराम ॥*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*ल्यावत नीठि कही हरि आयसु,*
*मंदिर ऊँच कराय उदारै ।*
*लाल विहारि हु श्याम सथापन,*
*रूप मनोहर आप निहारै ॥*
*संतन सेवत प्रीति लगाय रु,*
*अन्न न राखत पान सवारै ।*
*सामगरी कुछ राखि रसोय हु,*
*आत भये जन ज्यांत पियारै ॥४००॥*
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वैश्य भक्त प्रभु की आज्ञा मानकर गदाधर दासजी के पास आया और चलने के लिये प्रार्थना की । नहीं मानी तब हरि की आज्ञा सुनाकर बड़ी कठिनता से लेकर आया और उदारता पूर्वक सुन्दर और ऊँचा मंदिर बनवाकर उसमें बिहारीलाल श्यामसुन्दरजी की स्थापना की । उनका रूप बड़ा ही मनोहर था । आप देखते ही रहते थे ।
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गदाधर दासजी संतों की सेवा प्रीतिपूर्वक करते थे । अन्न पानादि जो कुछ भी आता था उसको उसी दिन खिला पिला देते थे, दूसरे दिन के लिये नहीं रखते थे । किन्तु रसोइये कुछ सामग्री छिपाकर भगवान् के भोग के लिये रख लेते थे । एक दिन रात्रि में संत आ गये । गदाधरदासजी ने रसोइयों से तथा पुजारियों से कहा- "जो कुछ सामग्री हो प्रीति पूर्वक बनाकर संतों को भोजन कराओ" ॥
(क्रमशः)

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