सोमवार, 13 मई 2024

*४३. गूढ़ अर्थ कौ अंग ६५/६८*

 
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*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Ram Gopal Das बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*४३. गूढ़ अर्थ कौ अंग ६५/६८*
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ओंकार आकास करि, वायु अगनि ता मांहि ।
कहि जगजीवन आप बिन, प्रिथमी जामै नांहि ॥६५॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि ओंकार पांच तत्वों को समाहित किये है । किन्तु आपके बिना यह पृथ्वी व इस पर रहने वाले मनुष्य अस्तित्व विहीन है ।
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सब मंहि अविगति रांमजी, करता करै सु होहि ।
कहि जगजीवन अगह गति, समझै बिरला कोइ ॥६६॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सबमें एक प्रभु ही है वे जो करते हैं वह ही होता है उनकी गति तक पहुँचना असम्भव है कोइ विरला ही जान पाता है ।
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अथौद कडाक अलप, अरथ अलेख अगाध ।
कहि जगजीवन नांउ धरि, रांम कहावै साध ॥६७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि आरम्भ अंत, सरल कठोर, थोड़ा, सार युक्त न लिखा जा सकनेवाला, जिसकी कोइ थाह न हो इतनी ही विभिन्न प्रवृत्तियों के नामों से शोभित हो साधुजन परमात्मा का स्वरुप होते हैं ।
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ईषद६ उदक थोडा७ कहिये, घणा८ कलप बिसतार९ ।
कहि जगजीवन बेहद१० वांणी, अगम रांम वो सार ॥६८॥
(६. ईषद=अल्प) (७. थोड़ा=कम) (८. घणा=अधिक) (९.बिसतार=फैलाव) (१०. बेहद=सीमारहित)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रवृत्ति में थोड़ा जल थोड़ा ही कहा जायेगा वह सागर नहीं होता अधिक ही विस्तार वाला सागर होता है । ऐसे ही सब सूक्ष्म रुप में कहा गया हो या विस्तार पूर्वक राम नाम छोटा होकर भी सागर सदृश है ।
(क्रमशः)

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