*🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷*
*🌷🙏 卐 सत्यराम सा 卐 🙏🌷*
*https://www.facebook.com/DADUVANI*
*गुरुमुख पाइये रे, ऐसा ज्ञान विचार ।*
*समझ समझ समझ्या नहीं, लागा रंग अपार ॥*
=============
*साभार ~ @Subhash Jain*
.
उपनिषद कहते हैंः अश्राव्य है परमात्मा, उसे सुना नहीं जा सकता। क्या मतलब इसका ? इसका मतलब यह कि किसी के कहने से तुम उसे न समझ सकोगे। वक्तव्य में वह नहीं आएगा। अश्राव्य है। मैं कह रहा हूं तुमसे कि परमात्मा क्या है। मैं लाख कहूंः ऐसा कहूं, वैसा कहूं; इस ढंग से कहूं, उस ढंग से कहूं, फिर भी तुम सिर्फ मेरे कहने से उसे न समझ पाओेगे। वह श्राव्य नहीं है।
.
मैं कुछ भी कहूं, मेरे कहने से तुम न समझ पाओगे। तुम उस दिन समझोगे, जब तुम्हारा अनुभव होगा। सुन-सुन कर नहीं समझोगे; जान कर–डूब कर समझोगे। तो अश्राव्य है परमात्मा। शास्त्र को पढ़ लिया, इससे भी समझ में नहीं आता। संतों के वचन सुन लिए, इससे भी समझ में नहीं आता। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि परमात्मा में कोई नाद नहीं है। परमात्मा परम नाद है। वह आखिरी संगीत है। वह चरम अवस्था है लय की। उसका माधुर्य है; उसकी स्वर लहरी है। उसकी मस्ती है।
.
जब तुम्हारे कान सभी शब्दोें से शून्य हो जाएंगे और तुम बाहर की बिलकुल न सुनोगे; जब तुम्हारे कान बाहर की तरफ काम ही नहीं करते होंगे; जब यह सारा बाहर का कोलाहल तुम्हारे जीवन से शांत, शून्य हो जाएगा; चाहे तुम बाजार में ही बैठे हो, तुम्हें कुछ और सुनाई न पड़ेगा। जब तुम्हें कुछ भी सुनाई पड़ता न होगा, तब तुम्हारे भीतर कुछ सुनाई पड़ेगा; तब तुम्हारे भीतर एक स्वर-लहरी जगेगी; एक नाद उमगेगा।
.
यह तुम्हारे अंतर्तम में खिलेगा फूल; यह कान से भीतर नही जाएगा। परमात्मा बाहर नहीं है–कि भीतर जाए तुम्हारे। न आंख से भीतर जाएगा; न कान से भीतर जाएगा। आंख और कान अगर बाहर में उलझे रहे, तो भीतर जो है, उसका तुम्हें पता ही नहीं चलेगा। परमात्मा भीतर है। जब तुम कान और आंख के सब द्वार-दरवाजे बंद करके बैठ जाओगे…।
.
इसलिए फकीर,संत, भक्त कहते हैः जब तुम सारे द्वार-दरवाजे बंद कर लोगे, जब आंखें उलटी हो जाएंगी, जब कान उलटे हो जाएंगे; जब इंद्रियां सक्रिय न होंगी, निष्क्रिय हो जाएंगी, तब तुम्हारे भीतर ही जो है–पहली दफा–इस शोरगुल के बंद हो जाने के कारण तुम्हें वह धीमा सा स्वर सुनाई पड़ना शुरू होगा।
.
समझनाः ‘मेरी तारीकियों के दामन में एक माहे तमाम होता है।’ वह जो गहन अंधकार है मेरे जीवन में, वह भी एकदम अंधेरा नहीं है, उसमें एक पूरा चांद भी है। ‘मेरी तारीकियों के दामन में एक माहे तमाम होता है।’ अंधेरे से अंधेरी रात है; अमावस है। सब तरफ अंधकार है। लेकिन फिर भी भीतर एक दीया जलता ही रहता है। एक रोशनी वहां बनी ही रहती है।
.
वही रोशनी तो तुम्हारा अस्तित्व है। वही रोशनी तो तुम्हारी श्वास है। वही रोशनी तो तुम्हारा प्राण है। वहां एक पूर्ण चांद सदा बना ही रहता है। और संतों ने सदा उसे चांद कहा–सूरज नहीं, क्योंकि चांद शीतल है; रोशन और फिर भी शीतल। उत्तप्त नहीं है; गर्म नहीं है। वासना उत्तप्त है–प्रार्थना शीतल। वासना में एक उत्तेजना है। प्रार्थना में एक शांति है। तो चांद शीतल…। ‘मेरी तारीकियों के दामन में एक माहे तमाम होता है।’ यह बात उलटी लगती है। अमावस की रात, अंधेरी रात–कहां चांद ?
.
लेकिन जिन्होंने भीतर जाकर देखा, उन्होंने पाया कि सब तरफ अंधेरी रात है, लेकिन भीतर चांद होता है। असल में अंधेरी रात में ही चांद का ठीक-ठीक दर्शन होता है। इसलिए तो दिन में चांद छिप जाता है, क्योंकि रोशनी सब तरफ है। चांद तो लटका है आकाश में अभी भी, रात दिखेगा। जब कोई व्यक्ति अपनी आंखों, अपने कानों, अपनी इंद्रियों के सब द्वार बंद कर देता है; सब तरफ अंधेरा हो जाता है, उस अंधेरे में वह जो धीमी सी रोशनी है भीतर, वह जो शीतल दीया जलता है, वह प्रकट होता है।
.
‘मेरी खामोशियों के परदोें में एक शोरे कलाम होता है।’ और जब कोई बिलकुल चुप हो जाता है, तब एक काव्य का जन्म होता है भीतर। नहीं कि तुम उसे पैदा करते हो। तुम सिर्फ देखते हो, उसे पैदा होते। जैसी तुम कमल को खिलते देखते हो। या एक पक्षी को आकाश में उड़ते देखते हो। तुम कुछ करते नहीं। ऐसे ही तुम्हारे भीतर एक गीत का जन्म होता है, एक कलाम होता है। तुम्हारे भीतर कोई गूंज उठने लगती है, जो तुम्हारी उठाई हुई नहीं है–खयाल रखना।
.
ऐसा नहीं है कि तुम बैठे-बैठे राम-राम, राम-राम, जप रहे हो। जब तक तुम जप रहे हो, तब तक दोे कौड़ी का तुम्हारा राम-राम है। जब तुम्हारे भीतर जाप होगा…। नानक ने उसको अजपा-जाप कहा है; कबीर ने भी अजपा-जाप कहा है। जब तुम्हारे बिना जपे कुछ भीतर उठेगा, नाम अपनेे आप होगा, तभी कुछ हुआ। तब तुमने मूलस्रोत के साथ संबंध जोड़ लिया।
.
लोग बाहर की शराब बंद करना चाहते हैं, मैं भीतर का शराबखाना खोलना चाहता हूं। असल में बाहर के शराबखाने तभी तक चलेंगे, जब तक भीतर का शराबखाना न खुले। जब भीतर की मस्ती मिल जाती है, फिर कौन बाहर भीख मांगता है ! जब आत्मा की शराब ढाल सकते हो, तो फिर अंगूर की शराब ढालने की कौन झंझट में पड़ेगा ? और बहार की शराब बेहोश करती है; भीतर की शराब होश लाती है।
.
बाहर की शराब तो तुम्हारे जीवन को धीरे-धीरे नष्ट कर देती है। भीतर की शराब तुम्हें और जीवंत बनाती है। एक दिन तुम्हारे भीतर के परमात्मा को उजागर कर देती है। और आज तक दुनिया में बाहर की शराब बंद नहीं हो सकी। क्योंकि आदमी शराब की खोज कर रहा है। खोज तो कर रहा है परमात्मा की शराब की । लेकिन उसका कुछ पता नही चलता। तो यही जो बोतलों में बंद मिल जाता है परमात्मा, उसी को खरीद लेता है।
.
यह धोखा है। लेकिन ध्यान रखनाः नकली सिक्के के धोखे में तुम तभी आते हो, जब असली सिक्के की तलाश हो। नहीं तो क्यों आओगे ? जिस आदमी को सिक्के से ही कुछ मतलब नहीं है …। तुम राह सेे जा रहे हो और एक सिक्का चांदी का पड़ा हुआ हैः तुम्हें मतलब ही नहीं है सिक्के से। तो तुम न तो असली सिक्का उठाओगे, न नकली सिक्का उठाओगे। लेकिन जो आदमी असली सिक्के की तलाश कर रहा है, वह झट से उठा कर खीसे में रख लेगा। हो न हो, असली हो। कौन जाने असली हो ?
.
दुनिया में शराब का जो इतना प्रभाव रहा है अनंत काल से, उसका कारण इतना है कि परमात्मा की हम तलाश कर रहे हैं। शराब में परमात्मा नहीं है। लेकिन कुछ झलक मिलती है–बेखुदी की; अपने को भूल जाने की। और यह ‘मैं’ इतना भारी है, इतना कांटों से भरा है, इतना जहरीला है कि इसे थोड़ी देर को भी आदमी भूल जाता है, तो कोई भी कीमत ज्यादा नहीं मालूम होती।
.
शराब से शरीर का स्वास्थ्य नष्ट होता है; उम्र कम होती है; बीमारी आती है। लेकिन फिर भी आदमी…। सब जानते है; जो शराब पीते हैं, वे जानते हैं। कुछ ऐसा नहीं है कि तुम्हारे जानने के लिए ही रुके हैं; कि मोरारजी देसाई उनको समझाएं। ये सब जानते हैं कि क्या-क्या खराबी है। लेकिन इन सारी खराबियों के बाद कोई चीज आकर्षित करती है। वह क्या है, जो आकर्षित कर रहा है ?
.
आदमी अपने अहंकार से बोझिल है। थोड़ी देर को इसे उतारकर रख देना चाहता है। राहत मिलती है; थोड़ी देर के लिए सारी…सारी चिंता-फिकर भूल जाना चाहता है। तुम उससे वह भी छीन लेना चाहता हो ! मैं उसे असली सिक्का देना चाहता हूं। असली सिक्का मिल जाए, तो नकली सिक्का अपने आप हाथ से गिर जाता है। उसे फिर कोई लिए नहीं चलता।
.
जिस दिन तुम्हें पता चल गया कि असली क्या है, असली को जानते ही नकली नकली हो जाता है। और असली को बिना जाने नकली नकली हो नहीं सकता। तुम नकली छीन रहे किसी आदमी से। असली उसने जाना नहीं है, और तुम नकली छीनना चाहते हो।
ओशो
.jpg)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें