बुधवार, 15 मई 2024

भगति बिना दुख ह्वै घणौं

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
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*दादू जब लग जीविये, सुमिरण संगति साध ।*
*दादू साधू राम बिन, दूजा सब अपराध ॥*
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सास्त्र पढि काँइ गरबिये, सुमिरत बेद पुराण ।
भगति बिना दुख ह्वै घणौं, बषनां छूटत प्राण ॥१७॥
स्मृति, वेद, पुराणादि, शास्त्रों को पढ़-पढ़कर शास्त्रज्ञान का अभिमान क्यों करता है । अरे ! बिना रामजी की भक्ति किये अंतिम समय में, परलोक में बहुत भारी दुःख भोगने पड़ेंगे ॥१७॥
“सो परत्र दुख पावही, सिर धुनि धुनि पछिताहि ।
कालहि कर्महि ईश्वरहि, मिथ्या दोष लगाहि ॥”
मानस ॥
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इसा बड़ा गरबैं गिल्या, बल कौ करि अहंकार ।
थे बषनां अब दीन ह्वै, सुमिरो सिरजनहार ॥१८॥
ऊपर कहे अनुसार इतने बड़े बड़े बलशाली भी गर्व करने के कारण समाप्त हो गये । वे भी जीवित न रह सके । अतः हे मनुष्यों ! गर्व का परित्याग करके दीनता धारण करते हुए सृजनहार परब्रह्म परमात्मा का भजन करो जिससे मनुष्य जीवन सुधर सके ॥१८॥
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थे साँवण का फिड़कला, गरब करौ सो काँइ ।
माया मद अभिमान तजि, बषनां लागो नाँइ ॥१९॥
हे मनुष्यों ! तुम ठीक वैसे ही महत्वहीन जीव हो जैसे श्रावण के मास में छोटे-मोटे उड़ने-फिरने वाले मच्छरादि होते हैं जो जन्मते और मरते रहते हैं । अतः क्यों व्यर्थ ही अपने आपके के बारे में अभिमान करते हो । अरे ! माया, मद = घमंड और अभिमान का त्याग करके भगवन्नाम जप करने में लग जाओ ॥१९॥
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बषनां सुमिरौ राम नैं, मन कौ गरब गमाइ ।
जीवत जग सोभा घणी, मूँवाँ मुकति सिधाइ ॥२०॥
मन में से गर्व को सर्वथा निःशेष करके रामजी के नाम का अहर्निश भजन-ध्यान करो । इससे जब तक जीवित रहोगे तब तक आपकी कीर्ति जगत में प्रभूत मात्रा में होगी और मरने पर मुक्ति लाभ प्राप्त करोगे ॥२०॥
इति गरब गंजन कौ अंग संपूर्ण ॥अंग १०४॥साषी २०५॥
(क्रमशः)

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