मंगलवार, 21 मई 2024

उजल हंस बग ऊजल होई

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
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*दादू हंस परखिये, उत्तम करणी चाल ।*
*बगुला बैसे ध्यान धर, प्रत्यक्ष कहिये काल ॥*
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*संत असंत पारिष कौ अंग ॥*
कोइल स्याम काग भी काला । 
भेष एक पणि लखिण निराला ॥
काग करक परि करै कुराली । 
वा बोलै अंबा की डाली ॥२॥
कोयल का रंग काला होता है । कौवे का रंग भी काला ही होता है । दोनों के रंग एक ही हैं किन्तु दोनों के आचरण भिन्न होते हैं । कौवा करक = हाडों पर बैठकर काँव-काँव करता है जबकि कोयल आम की डाली पर बैठकर मधुर स्वर में बोलती है । ऐसे ही ऊपरी वेश के आधार पर संत-असंत का निर्णय न करके उनके आचरण के आधार पर करना चाहिये ॥२॥
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उजल हंस बग ऊजल होई । 
बषनां परख करैगो कोई ॥
उह चंच भरि भरि मोटी धारै । 
उह ध्यान धरै अरु मीन संघारै ॥३॥
हंस का रंग श्वेत होता है । बगुले का रंग भी सफेद होता है । किन्तु उनके आचरण के आधार पर कोई-कोई ही उनकी सही पहचान कर पाता है । हंस चौंच में मोती धारण करके मोतियों का आहार करता है जबकि बगुला आँखें बन्द करके ध्यान मग्न होने का स्वांग करता हुआ अपनी दृष्टि सदैव अपने आहार मछली पर रखता है और अवसर पाते ही उसे खा जाता है ॥३॥
(क्रमशः)

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