शुक्रवार, 24 मई 2024

*४३. गूढ़ अर्थ कौ अंग ८१/८४*

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*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Ram Gopal Das बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*४३. गूढ़ अर्थ कौ अंग ८१/८४*
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ब्रस२ वाणी बरस रांमजी, व्रस हरि बसत बिलास ।
कालौ बादल प्रेम रस, सु कहि जगजीवनदास ॥८१॥
(२. ब्रस बाणी=हे भगवन् ! गुरु उपदेश की वर्षा हो)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे भगवान गुरु उपदेश की वर्षा हो । व प्रभु महिमा सुनते रहें । श्याम मेघ सघनता का प्रतीक है । जो आनंद प्रदायी है ।
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त्रिय रति त्रिय थति तीन गुण, चौथा पद महि बास ।
ब्रह्म भगति समझ्या रहै, सु कहि जगजीवनदास ॥८२॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सभी गुण त्रयात्मक है जैसे सत रज तम आदि इनसे उपर चतुर्थ में प्रभु निवास है । जो ब्रह्म भक्ति जानते हैं वे ही जन इसे समझ सकते हैं ।
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भै प्रिथमी अस बसि मिली, दूध दहि ल्यौ कोइ । 
कहि जगजीवन हरि भगत, हरि भजि हरि मंहि जोइ ॥८३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि पृथ्वी पर जीवों के पृथक पृथक व्यवहार व आचरण है । किन्तु प्रभु भक्त इन सबसे परे स्मरण में ही चित्त लगाते हैं ।
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पई पारस पत्थर गिणै, सा हरि समझै सुंनि३ ।
कहि जगजीवन रांम रत, मगन रहै गहि मुंनि४ ॥८४॥
{३. सुंनि=शून्य(ब्रह्म)}    (४. मुंनि=मौन व्रत)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो पारस को पाकर भी उसे साधारण पत्थर जानते हैं वे परमात्मा को भी शून्य मानते हैं । जो प्रभु में मगन हैं वे जन वे परमात्मा के स्मरण में मौन रह कर मगन रहते हैं ।
(क्रमशः)

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