शनिवार, 11 मई 2024

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*दादू उलट अनूठा आप में, अंतर सोध सुजाण ।*
*सो ढिग तेरे बावरे, तज बाहर की बाण ॥*
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*साभार ~ @Subhash Jain*
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हमारे मस्तिष्क में एक आखरी जगह है मस्तिष्क की, जहां लोग चोटी उगाते हैं, वह चोटी सिर्फ सहस्रार का प्रतीक है कि वहां केंद्र है। सारे बाल काट डालते थे, सिर्फ चोटी छोड़ देते थे। लेकिन चोटी उगाने से कुछ नहीं होता। वह चोटी तो सिर्फ जगह थी बताने को कि यहां अंतिम द्वार है जहां हमें पहुचना है। यह ध्यान रखने के लिए है। 'ध्यान' का स्मरण चिन्ह है यह।
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चोटी तो बहुत लोग रखे हुए हैं, ध्यान वगैरह कोई नहीं करता। चोटी कितनी ही बड़ी हो, ध्यान तो पहले ही द्वार पर रहता है। मूलाधार पर ही ध्यान सिमट कर रह जाता है। चोटी उसे इसलिए कहते हैं कि वह शिखर है। वह जीवन का शिखर वहां छिपा है, इसलिए चोटी ! यह शिखर है, गौरी शंकर है वहां। वहीं छिपा है जीवन का आखरी द्वार, जहां से हम परमात्मा में प्रवेश पा सकते हैं।
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प्रवेश द्वार पर ही मत बैठे रहना, निकास का मार्ग भी खोजना। इसी को निर्वाण मार्ग कहा है बुद्ध ने। यह सहस्रार ही है, प्रत्येक का exit, इसे ही मोक्ष कहते हैं। केवल चोटी रख लेने से कुछ न होगा। उसे समझना होगा। उस तक पहुंचना होगा।
ओशो

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