शनिवार, 25 मई 2024

*बिन पारिष अधिकार कौ अंग ॥*

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷🙏 *#बखनांवाणी* 🙏🌷
*https://www.facebook.com/DADUVANI*
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
.
*दादू यह परिख सराफी ऊपली, भीतर की यहु नाहिं ।*
*अन्तर की जानैं नहीं, तातैं खोटा खाहिं ॥*
=============
*बिन पारिष अधिकार कौ अंग ॥*
परिष नहीं तिहि खोटा साधा, ठगिया खोटै नांणैं ।
खोटा खरा दहौं की बषनां, जुगति जोहरी जाणैं ॥४॥
जिनमें सिक्कों को परखने की समझ नहीं है, वे खोटा सिक्का ले लेते हैं । इसी प्रकार जिनमें सच्चे और झूंठे को परखने की सामर्थ्य नहीं होती है, वे झूंठों के द्वारा ठगे जाते हैं । बषनांजी कहते हैं, खोटे और खरे-दोनों की परख = पहचान जौहरी ही कर पाता है ॥४॥
.
*अपारिष कौ अंग ॥*
पाइ मणी अरु माथै मणियाँ, भूछ गूजरी बांधौ ।
बषनौं कहै पारिषा पाखै, भूली भेद न लाधौ ॥५॥
एक भूछ = मूर्ख गूजरी ने असली-नकली की परख करने की युक्ति को बिना जाने पाँवों में मणि तथा माथे पर काँच का टुकड़ा बांध लिया । उसने ऐसा इसलिये किया क्योंकि उसे मणि और काँच का फर्क मालूम नहीं था ॥५॥
.
*पारिष कौ अंग ॥*
बषनौं कहै पारिखू मिलियौ, बिगति दहूँ की दाखी ।
कीयौ पर्हौ काच कौ मणियौ, मणि माथा परि राखी ॥६॥
बषनांजी कहते हैं, गूजरी = आत्मजिज्ञासु को पारिखू = परख जानने वाला = गुरु मिल गया । उसने मणि और काँच दोनों को पहचानने की युक्ति बतादी = संसार सुख और आत्मसुख दोनों का भेद समझा दिया । परिणामस्वरूप गूजरी = आत्मजिज्ञासु ने कांच = संसार को दूर फैंक दिया और मणि = आत्मसुख को माथे पर बांध लिया = हृदय में धारण कर लिया ॥६॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें