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*दादू सतगुरु मारे शब्द सौं,*
*निरखि निरखि निज ठौर ।*
*राम अकेला रह गया, चित्त न आवै और ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)*
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सवैया ग्रन्थ ~ भाग ३
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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सवैया ग्रंथ भाग ३
शूरातन का अंग (५)
शब्द की संगि१ लगी जहि अंग२,
सु मारहुवी३ सोई स्वाद४ हिं जानैं ।
ज्ञान की चोट रही नहिं ओट हो,
हाथ लही ये पर्यों पहचानैं ॥
सु बुद्धि को सेल गुरु गहि मेल५ हो,
मारि लियो महा चंचल प्रानैं९ ।
पर्यो सोइ घाव६ गिर्यो मन राव हो,
रज्जब पैंड७ न छाड़ हि थानैं८ ॥२॥
जिसके अंत:करण२ में शब्द रूप शक्ति१ लगकर उसका अच्छा अघात३ हुआ है, वही उसके आनन्द४ को जानता है ।
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ज्ञान की चोट लगने में मल विक्षेपादि कोई भी आड़ जिसके नहीं रही है, वही हृदय हाथ में झेल कर योग संग्राम में पड़ा हुआ अपने को पहचानता है ।
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सु बुद्धि रूप सेल गुरु से ग्रहण करके अंत:करण में रक्खा५ है जिससे महा चंचल प्राणों९ को मार लिया है अर्थात अपने अधीन कर लिया है ।
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और उसी ज्ञान का अघात६ पड़ा है जिससे मन रूप राजा भी योग संग्राम में गिर गया है । अब यह मन ब्रह्म रूप स्थान८ को छोड़ कर एक डग९ भी नहीं जा सकता ।
(क्रमशः)

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