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*तहँ भाव प्रेम की पूजा होइ,*
*जा पर किरपा जानै सोइ ।*
*कृपा करि हरि देइ उमंग,*
*तहँ जन पायो निर्भय संग ॥*
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*परिच्छेद १३२~काशीपुर में श्रीरामकृष्ण*
*(१)कृपासिन्धु श्रीरामकृष्ण*
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श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ काशीपुर में रहते हैं । शुक्रवार, ११ दिसम्बर १८८५ को श्यामपुकुर का मकान छोड़कर उन्हें यहाँ ले आया गया । यहाँ आये आज बारह दिन हो गये । इतनी कठिन बीमारी होते हुए भी उन्हें यही चिन्ता रहती है कि किस तरह भक्तों का कल्याण हो । दिन-रात किसी-न-किसी भक्त के सम्बन्ध में चिन्ता किया करते हैं ।
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श्रीरामकृष्ण की सेवा के लिए बालक भक्त क्रमश: काशीपुर में आकर रह रहे हैं । अभी भी बहुतेरे भक्त अपने घर आया जाया करते हैं । गृही भक्त प्रायः रोज आकर देख जाया करते हैं, कभी कभी रात को भी रह जाते हैं ।
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इस समय तक लगभग सभी भक्त एकत्रित हो गये हैं । १८८१ ई. से भक्तों का समागम होने लगा था । अन्त के प्रायः सभी भक्त आ गये हैं । १८८४ ई. के अन्तिम भाग में शरद और शशी ने श्रीरामकृष्ण का प्रथम दर्शन किया था ।
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कालेज की परीक्षा के बाद, १८८५ ई. की मई-जून से वे सदा ही उनके पास आया-जाया करते हैं । गिरीश घोष ने श्रीरामकृष्ण का सर्वप्रथम दर्शन १८८४ ई. के सितम्बर मास में स्टार थिएटर में किया था, शारदा ने १८८४ दिसम्बर के अन्त में, तथा सुबोध और क्षीरोद ने १८८५ अगस्त में ।
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आज बुधवार है, २३ दिसम्बर १८८५ । आज सुबह से प्रेम की मानो लूट मची हुई है । श्रीरामकृष्ण निरंजन से कह रहे हैं, 'तू मेरा बाप है, मैं तेरी गोद में बैठूँगा ।' कालीपद की छाती पर हाथ रखकर वे कह रहे हैं, 'चैतन्य हो', और उनकी ठुड्डी पकड़कर उनका दुलार कर रहे हैं ।
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कह रहे हैं, 'जिसने हृदय से ईश्वर को पुकारा होगा, जिसने सन्ध्योपासना की होगी, उसे यहाँ आना ही होगा ।' आज प्रातःकाल दो भक्त-स्त्रियों पर भी कृपादृष्टि हो गयी । समाधिस्थ होकर उन्होने अपने पैर से उनका स्पर्श किया ।
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उस समय उन स्त्रियों की आँखों में आँसू आ गये । एक ने रोते हुए कहा, 'आपकी इतनी कृपा !' सचमुच ही, आज श्रीरामकृष्ण ने प्रेम की लूट मचा रखी है । सींती के गोपाल पर कृपा करने की इच्छा है, इसलिए कह रहे हैं, 'उसे बुला ले आओ ।'
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सन्ध्या हो गयी है । श्रीरामकृष्ण जगन्माता की चिन्ता कर रहे हैं । कुछ देर बाद बड़े ही धीमे स्वर में दो-एक भक्तों के साथ श्रीरामकृष्ण बातचीत कर रहे हैं । कमरे में काली, चुन्नीलाल, मास्टर, नवगोपाल, शशी, निरंजन आदि भक्त हैं ।
(क्रमशः)
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