गुरुवार, 9 मई 2024

*४३. गूढ़ अर्थ कौ अंग ६१/६४*

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*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Ram Gopal Das बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*४३. गूढ़ अर्थ कौ अंग ६१/६४*
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तुंबा सुत सब मांहि है, तुंबा सुत धुर थंभ ।
कहि जगजीवन जंत्र ताति गुण, केइ केइ तन आरंभ ॥६१॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि संसार के सभी जीवों में कड़वाहट है ही यह कडड़वाहट ही माधुर्य को बल देती है । उसके महत्व को बताती है जो जैसा पात्र होता है उसका गुण भी वैसा ही होता है ।
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कहि जगजीवन प्रिथवी ऊपरि, जांम्या ते सब घास ।
हरिजन हरि मंहिं मिलि रहै, रांम भगति की आस ॥६२॥
संतजगजीवन जी कहते हैं जीव इस पृथ्वी पर जन्में तो बहुत है पर वे सब घास फूस की तरह सब वृद्धि को ही प्राप्त हुए हैं । सिर्फ प्रभु भक्तों का ही प्रयास रहता है कि वे परमात्मा से मिलें व वे इसी आशा में भक्ति करते रहते हैं ।
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एकै मांहि अनेक कण, कण कण मांहीं घास ।
कहि जगजीवन रांमजी, एक तुम्हारी आस ॥६३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि एक जर्रे में भी अनेक कण होते हैं यह प्रभु की सूक्ष्म कृपा है । और कण कण में घास के बीज रहते हैं जो प्रभुके स्नेह रुपी जल से सींचित हो प्रस्फुटित हो घास हो जाते हैं । हे प्रभु यह जीव तो आप से ही आशा रखता है ।
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प्रिथमी१ आप२ कै तेज३ हरि, कै हरि वायु४ अकास५ ।
ए उतपति कहाँ रांमजी, सु कहि जगजीवनदास ॥६४॥
(१. प्रिथमी=पृथ्वी)   (२. आप=जल)   (३. तेज=अग्नि)    (४. वायु=हवा)   (५. आकाश=पाँच तत्त्वों में एक)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि पांच तत्व पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु व आकाश सभी की उत्पत्ति कर्ता परमात्मा है जिनमें यह जीवन समाहित है ।
(क्रमशः)

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