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*दादू पूरणहारा पूरसी, जो चित रहसी ठाम ।*
*अन्तर तैं हरि उमग सी, सकल निरंतर राम ॥*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*गदाधरदासजी की पद्य टीका*
*इन्दव-*
*बाग बुरहान पुरै ढिग बैठक,*
*त्याग घरै हरि से अनुरागे ।*
*जात नहीं पुर लोग निहोरत,*
*मान लियो सुख और न पागे१ ॥*
*मेह भयो तन भीज गये कफ२,*
*श्याम कहै निशि कांपन लागे ।*
*साह कहा प्रभु ल्याव उन्हें इत,*
*मंदिर दे करवाय सभागे३ ॥३९९॥*
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गदाधरदासजी को वैराग्य होने से वे घर को त्याग कर बुरहानपुर के पास एक बाग में आकर बैठ गये और वहीं हरि में अनुरक्त हो गये ।
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लोग बहुत प्रार्थना करते थे किन्तु आप ग्राम में नहीं जाते थे, आपने वहीं सुख मान लिया था । किसी अन्य में प्रेम१ नहीं करते थे ।
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एक दिन अति वर्षा होने से आपका शरीर तथा वस्त्र२ सब भीग गये । आप रात्रि में शीत से काँपने लगे तब भक्त के दुःख को देखकर भगवान् को बड़ी दया आई । श्यामसुन्दर भगवान् ने रात्रि में कहा- अब तुम शीत से कांपने लगे हो घर बनवा लो ।
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फिर प्रभु ने रात्रि में एक भक्त सेठ को स्वप्न में कहा- "तेरे पास बहुत धन है, जो बाग में मेरे भक्त गदाधर दासजी हैं, उन्हें इधर लाकर उनको एक सुन्दर मन्दिर बनवा दे, ऐसा करने से तू भाग्यशाली३ बना रहेगा अर्थात् तेरे घर में लक्ष्मी बनी रहेगी"॥
(क्रमशः)

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