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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*प्रेम लग्यो परमेश्वर सों तब,*
*भूलि गयो सिगरो घरु बारा ।*
*ज्यों उन्मत्त फिरें जितहीं तित,*
*नेक रही न शरीर सँभारा ॥*
*श्वास उसास उठे सब रोम,*
*चलै दृग नीर अखंडित धारा ।*
*सुंदर कौन करे नवधा विधि,*
*छाकि पर्यो रस पी मतवारा ॥*
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*(३)श्रीकालीपूजा*
शरद ऋतु की अमावस्या है, - रात के आठ बजे होंगे । उसी ऊपरवाले कमरे में पूजा का सारा प्रबन्ध किया गया है । अनेक प्रकार के पुष्प, चन्दन, बिल्वपत्र, जवापुष्प, खीर तथा अनेक प्रकार की मिठाइयाँ भक्तगण ले आये हैं ।
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श्रीरामकृष्ण बैठे हुए हैं । चारों ओर से भक्त-मण्डली घेरे हुए बैठी है । शरद, राम, गिरीश, चुन्नीलाल, मास्टर, राखाल, निरंजन, छोटे नरेन्द्र, बिहारी आदि बहुत से भक्त हैं । श्रीरामकृष्ण ने कहा - 'धूना ले आओ ।' कुछ देर बाद श्रीरामकृष्ण ने जगन्माता को सब कुछ निवेदित कर दिया । मास्टर पास बैठे हुए हैं ।
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मास्टर की ओर देखकर श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं - 'सब लोग थोड़ी देर ध्यान करो ।' भक्तगण ध्यान करने लगे । पहले गिरीश ने श्रीरामकृष्ण के श्रीचरणों में माला चढ़ायी, फिर मास्टर ने गन्ध-पुष्प चढ़ाये । तत्पश्चात् राखाल ने, फिर राम ने । इसी तरह सब भक्त श्रीचरणों में पुष्प-दल चढ़ाने लगे ।
श्रीचरणों में फूल चढ़ाकर निरंजन 'ब्रह्ममयी' कहकर भूमिष्ठ हो प्रणाम करने लगे । भक्तगण 'जय माँ, जय माँ' कह रहे हैं ।
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देखते ही देखते श्रीरामकृष्ण समाधिमग्न हो गये । भक्तों की आँखों के सामने ही श्रीरामकृष्ण में एक आश्चर्यजनक परिवर्तन हो गया । उन लोगों ने उनके मुख-मण्डल पर दैवी ज्योति का अवलोकन किया । उनके दोनों हाथ इस प्रकार उठे हुए थे जैसे कि वे भक्तों को वरदान तथा अभय-दान दे रहे हों ।
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उनका शरीर निश्चल है, बाह्य संसार का उन्हें बिलकुल ज्ञान नहीं । वे उत्तर की ओर मुँह किये हुए बैठे हैं । क्या इनके भीतर साक्षात् जगन्माता आविर्भूत हुई हैं ? सभी अवाक् हो, एकटक दृष्टि से इस अद्भुत वराभयदायिनी जगन्माता की जीवन्त मूर्ति का दर्शन कर रहे हैं । भक्तगण स्तुतिपाठ कर रहे हैं । पहले एक भक्त गाता है, उसके पीछे सब एक ही स्वर में उसी पद की आवृत्ति करते हैं ।
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गिरीश गा रहे हैं –
(भावार्थ) - देवताओं के बीच वह कौन रमणी चमक रही है, जिसके घने काले केश मेघ-श्रेणी के समान जान पड़ते हैं ? वह कौन है, जिसके रक्तोत्पल युगलचरण शिव की छाती पर विराजमान हैं ? वह कौन है, जिसके नखों में रजनीकर का वास है और जिसके पैरों की दीप्ति सूर्य को भी मात कर रही है ? वह कौन है, जिसके मुख पर मधुर हास्य शोभायमान है ओर जिसका विकट अट्टाहास रह-रहकर दसों दिशाओं को गुँजा दे रहा है ?
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उन्होंने फिर गाया –
गाना - दीनतारिणी, दुरितहारिणी,
सत्त्व-रजस्तम-त्रिगुणधारिणी ।
सृजन-पालन-निधन-कारिणी,
सगुणा निर्गुण सर्वस्वरूपिणी ।...
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बिहारी गा रहे हैं - (भावार्थ) –
"ऐ श्यामा ! शवारूढ़ा माँ सुनो, मैं तुम्हारे पास अपने हृदय की आन्तरिक कामना व्यक्त करता हूँ । जब मेरी अन्तिम साँस इस देह को छोड़ चलेगी तब, ऐ शिवे, तुम मेरे हृदय में प्रकाशित होना । उस समय, माँ, मैं मन-मन वन-वन घूमकर सुन्दर जवा-कुसुम चुनकर ले आऊँगा, और उसमे भक्ति-चन्दन मिलाकर तुम्हारे श्रीचरणों में पुष्पांजलि दूँगा ।"
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भक्तों के साथ मणि गा रहे हैं - (भावार्थ) –
“ओ माँ ! सब कुछ तुम्हारी ही इच्छा से होता है । ऐ तारा ! तुम इच्छामयी हो ! तुम अपने कर्म आप ही करती हो, पर लोग बोलते हैं 'मैं करता हूँ ।' माँ, तुम हाथी को कीचड़ में फँसा देती हो, पंगु को गिरि लाँघने में समर्थ कर देती हो, किसी को तुम इन्द्रत्वपद दे देती हो, तो किसी को अधोगामी बना देती हो । अम्बे ! मैं यन्त्र हूँ, तुम यन्त्री हो; मैं गृह हूँ, तुम गृहिणी हो; मैं रथ हूँ, तुम रथी हो । माँ, तुम मुझे जैसा चलाती हो, वैसा ही चलता हूँ ।"
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पुनः –
"ऐ माँ, तुम्हारी करुणा से सभी कुछ सम्भव हो सकता है । अलंघ्य पर्वत के समान विघ्न-बाधा भी तुम्हारी कृपा से दूर हो जाती है । तुम मंगलनिधान हो, तुम सभी का मंगल करती हो - सभी को सुख और शान्ति प्रदान करती हो । तो फिर माँ, अपने फलाफल की चिन्ता करके मैं ही क्यों ही क्यों व्यर्थ जला जा रहा हूँ ?"
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पुनः –
"ओ माँ आनन्दमयी, मुझे निरानन्द न कर देना !....”
पुनः –
"निबिड़ अंधकार में, ऐ माँ, तेरी अरूप-राशि चमक उठती है ।...”
श्रीरामकृष्ण अब प्रकृतिस्थ हो गये हैं । उन्होंने इस गीत को गाने को कहा - "ऐ श्यामा ! सुधातरंगिणी ! नहीं मालूम, तुम कब किस रंग में रहती हो ।"
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इस गाने के समाप्त होने पर श्रीरामकृष्ण 'शिव के साथ सदा ही रंग में रंगी हुई तुम आनन्द में मग्न हो' इस गीत को गाने के लिए आदेश कर रहे हैं ।
भक्तों के आनन्द के लिए श्रीरामकृष्ण कुछ खीर अपने मुख में लगा रहे हैं, परन्तु उसी समय भाव में विभोर हो बिलकुल बाह्य संज्ञाशून्य हो गये ।
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कुछ देर बाद भक्तगण श्रीरामकृष्ण को प्रणाम करके प्रसाद लेकर बैठकखाने में चले गये । सब एक साथ आनन्दपूर्वक प्रसाद पाने लगे ।
रात के नौ बजे का समय होगा । श्रीरामकृष्ण ने कहला भेजा, ‘रात हो गयी है, सुरेन्द्र के यहाँ आज कालीपूजा है, तुम लोगों का न्योता है, तुम लोग जाओ ।’
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भक्तगण आनन्द करते हुए सिमला में सुरेन्द्र के यहाँ पहुँचे । सुरेन्द्र ने आदरपूर्वक उन्हें ऊपरवाले बैठकखाने में ले जाकर बैठाया । घर में उत्सव है, सब लोग गीत और वाद्य के द्वारा आनन्द मना रहे हैं ।
सुरेन्द्र के यहाँ से प्रसाद पाकर लौटते हुए भक्तों को आधी रात से अधिक हो गयी ।
(क्रमशः)

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