मंगलवार, 11 जून 2024

*श्री रज्जबवाणी, साधू का अंग(६)*

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*साधु बरसैं राम रस, अमृत वाणी आइ ।*
*दादू दर्शन देखतां, त्रिविध ताप तन जाइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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सवैया ग्रन्थ ~ भाग ३
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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सवैया ग्रंथ भाग ३
साधु का अंग (६)
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साधु मिले तो सुधा रस पीजिये,
आतम आनन्द होत अपारो ।
ज्यों शशि देखि सु मुदित कुमोदिनि,
कूंची के लागे खुले जु किवारो ॥
हो सीप को संपुट स्वाति सौं ऊघरे१,
रोजा खुले जब देखिये तारो ।
हो रज्जब रैन गई चकवा की ज्यों,
आय मिल्यो मानो सूर पियारो ॥३॥
संत मिल जाँय तो उनका उपदेश रूप अमृत रस अवश्य पान करना चाहिये । उससे जीवात्मा को अपार आनन्द प्राप्त होता है ।
जैसे चन्द्रमा को देखकर कुमोदिनी प्रसन्न होती है । ताले में कूंची लगते ही द्वार खुल१ जाता है ।
स्वाति को देखकर सीप का संपुट खुल जाता है । तारे को देखकर रोजा खुलता है ।
रात्रि के जाने पर और सूर्य के आने पर चकवा चकवी मिलकर प्रसन्न होते हैं । वैसे ही संतों के मिलने पर मानो प्रियतम प्रभु ही मिल गये हों ऐसा आनन्द होता है ।
(क्रमशः)

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