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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
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*पूरण ब्रह्म विचारिये, तब सकल आत्मा एक ।*
*काया के गुण देखिये, तो नाना वरण अनेक ॥*
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*समद्रिष्टि निर्दोष कौ अंग ॥१ (*१ यह अंग तथा इसकी एक साषी वि.सं. १७८० व १७८५ में लिखी दोनों ही पुस्तकों में नहीं है जबकि श्रीमंगलदासजी महाराज द्वारा सम्पादित पुस्तक में है । अतः इन दोनों का स्त्रोत वही है ।)*
पाणी सौं पैदा हुया, बषनां बुरा न कोइ ।
सारै मांहैं सो बुरा, जो पाणी पाखै होइ ॥१॥
बषनांजी कहते हैं, सभी प्राणी = माता के रज में पिता का वीर्य पड़ने से ही उत्पन्न होते हैं । अतः कोई भी बुरा = ऊँच-नीच, अच्छे-बुरे नहीं है । वस्तुतः सबमें से बुरा है जो पानी के बिना होता है । अर्थात् जो एक जैसे रज-वीर्य से उत्पन्न मनुष्य-मनुष्य में भेद उत्पन्न करता है ॥ अथवा बिना पानी = सामर्थ्य का होता है ॥ यहां प्रथम अर्थ ही अधिक संगत है क्योंकि अंग का नाम समद्रिष्टि निर्दोष है ॥१॥
इति समद्रिष्टि निर्दोष कौ अंग संपूर्ण ॥अंग ११४॥साषी २१९॥
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*देहाभिमान कठोर कुरत(कृत्य) कौ अंग ॥*
बषनां हरिजन बरषिया, जल थल भरे अनेक ।
करम कठोराँ माणसाँ, रोम न भीगौ एक ॥१॥
बषनांजी कहते हैं, हरिजन = परमात्मा के परमभक्त अपने आत्मानुभव को शब्दों के माध्यम से आगत सभी जिज्ञासुओं को सुनाते हैं । उस साक्षात्कार जन्य अनुभवीय ज्ञान को सुनकर अनेकों जल = आत्मजिज्ञासु तथा थल = संसारासक्त विषयी जीव भरे = आत्मसाक्षात्कारी हो गये किन्तु भाग्यहीन मनुष्यों ने उन आत्मसाक्षात्कारी संत महात्माओं का संग करने का प्रयत्न ही नहीं किया । जिस कारण उनमें रतिमात्र भी परिवर्तन नहीं हुआ । वे संसारी के संसारी ही रह गये ॥१॥
(क्रमशः)

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