मंगलवार, 4 जून 2024

*बिना सक्ति बडाई कौ अंग*

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*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी*
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*दादू मड़ा मसाण का, केता करै डफान ।*
*मृतक मुर्दा गोर का, बहुत करै अभिमान ॥*
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*बिना सक्ति बडाई कौ अंग ॥*
कीड़ी खैंचैं ऊट नैं, मरण मतै इहिं भारि ।
आंबरि खिंवती बीजली, गदही लातन मारि ॥१॥
जिनमें किसी कार्य विशेष को करने की शक्ति = सामर्थ्य तो होती नहीं है किन्तु करने का दम भरते हैं, वे निश्चय ही निंदनीय हैं । यदि चींटी ऊंट को अपने ऊपर बैठाकर ढोये या किसी गाड़ी आदि में बैठाकर उस गाड़ी को खींचे तो यह कार्य चींटी के लिये अपनी मृत्यु को निमंत्रण देने के सदृश ही सिद्ध होगा । इसी प्रकार जमीन पर खड़ी गदही आकाश में चमकती बिजली को रोकने के लिये यदि लात मारे तो क्या उसके द्वारा लात मारने से बिजली का चमकना बन्द हो सकता है ॥१॥
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*मछरता अभिमान कौ अंग ॥*
औराँ की ऊतारणी, आपा को अधिकार ।
बषनां भेखाँ मैं मड्यौ, इहि बिधि कौ ब्योहार ॥२॥
औरों = अन्यों को नीचा दिखाना और अपने आपको ऊंचा सिद्ध करना; आपा = अपने अहम् की पूर्ति हेतु ही नाना प्रपंच करना आजकल के भेखाँ = संप्रदायों के आचरण मड्यौ = स्थिर हो गये हैं ॥२॥
हाथी कौ खड़कौ सुण्यौं, भुस्यौ सोबतौ स्वान ।
बषनां सूरिज तेज कौ, पतँग करै अभिमान ॥३॥
हाथी के चलने-फिरने की आवाज सुनकर सोता हुआ भी कुत्ता भौंकता है । बताइये, क्या कुत्ते के भौंकने से हाथी अपना चलना छोड़ देगा ? कदापि नहीं ! बषनांजी कहते हैं, इसी प्रकार यदि सूर्य के प्रकाश का अपमान = तिरस्कार करके पतंगा यह कहे कि मैं पूरे विश्व को प्रकाश व उष्णता देने में समर्थ हूँ तो कौन उसकी बात सही मानेगा । अतः झूठा अभिमान करना साधक के लिये अनुपादेय है ॥३॥
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घणहर गरज्यौ गगन मैं, सुणि कूद्यौ सार्दूल ।
बषनां वहि कौ काँइ घट्यौ, इहि खोयौ अपणौं मूल ॥४॥
घणहर = बादलों को आकाश में गर्जन करता हुआ सुनकर सिंह उनसे समता करने के लिये गर्जन करने लगा और गर्जना में इतना मस्त हो गया कि कुवे मैं गिर गया । बषनांजी कहते हैं, वहि = बादलों को गर्जना करने से क्या नुकसान हुआ । कुछ नहीं । क्योंकि यह उनका स्वाभाविक कर्म है जबकि बिना बादलों के बराबर की क्षमता वाला सिंह गरजकर क्या लाभ ले सका । कुछ नहीं । उल्टे कूवे में गिरकर उसने आपको को ही संकटापन्न कर लिया ॥४॥
इति निंद्या कौ अंग संपूर्ण ॥अंग ११३॥साषी २१८॥
(क्रमशः)

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