गुरुवार, 6 जून 2024

*४३. गूढ़ अर्थ कौ अंग ९३/९६*

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*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Ram Gopal Das बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*४३. गूढ़ अर्थ कौ अंग ९३/९६*
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अविगत अंतर अलख, करतार समान ।
कहि जगजीवन परम थति, रांम कहै गुर ग्यांन ॥९३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु या सदगुरू आप सृजनहार से हैं । आपके पास परम ज्ञान रुपी थाती या धरोहर है जिससे आपने हमें राम रुपी ज्ञान सुनाया है ।
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कहि जगजीवन से समझि, षा हरि नांम निवास ।
धँसै निरंतर नूर मंहि, सबद संहिता सास ॥९४॥  
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे जीव समझे तो स वर्ण में ही हरि नाम है । जो सदा प्रभु के तेजोमय स्वरूप में रहता है ।
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निरंजन फौ फारगत५, सुमिरन करता मांहिं ।
कहि जगजीवन रांम भगति बिन, दूजा कोई नांहिं ॥९५॥
(५. फारगत=उत्तरदायित्व से मुक्त होना)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि संसार से उपराम हो तभी निरंजन प्रभु का स्मरण होगा । संतजगजीवन जी कहते हैं कि राम भक्ति के बिना इस संसार में कुछ सार्थक नहीं है ।
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फा फारिक संसार थें, अनहद में बास ।
दो दरसन रस रांमजी, सु कहि जगजीवनदास ॥९६॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि संसार से निवृत हो तभी अनहद धुन मैं निवास होता है । है प्रभु जी आप दर्शन दीजिये संत प्रार्थना करते हैं ।
(क्रमशः)  

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