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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय
श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Ram
Gopal Das बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ
सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*४३. गूढ़
अर्थ कौ अंग ९३/९६*
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ए
अविगत अंतर अलख, क करतार समान ।
कहि
जगजीवन परम थति, रांम कहै गुर ग्यांन ॥९३॥
संतजगजीवन
जी कहते हैं कि हे प्रभु या सदगुरू आप सृजनहार से हैं । आपके पास परम ज्ञान रुपी
थाती या धरोहर है जिससे आपने हमें राम रुपी ज्ञान सुनाया है ।
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कहि
जगजीवन से समझि, षा
हरि नांम निवास ।
धँसै
निरंतर नूर मंहि, सबद संहिता सास ॥९४॥
संतजगजीवन
जी कहते हैं कि हे जीव समझे तो स वर्ण में ही हरि नाम है । जो सदा प्रभु के तेजोमय
स्वरूप में रहता है ।
.
न
निरंजन फौ फारगत५, सुमिरन करता
मांहिं ।
कहि
जगजीवन रांम भगति बिन, दूजा कोई नांहिं ॥९५॥
(५.
फारगत=उत्तरदायित्व से मुक्त होना)
संतजगजीवन
जी कहते हैं कि संसार से उपराम हो तभी निरंजन प्रभु का स्मरण होगा । संतजगजीवन जी कहते
हैं कि राम भक्ति के बिना इस संसार में कुछ सार्थक नहीं है ।
.
फा
फारिक संसार थें, ई अनहद में बास ।
दो
दरसन रस रांमजी, सु कहि जगजीवनदास ॥९६॥
संतजगजीवन
जी कहते हैं कि संसार से निवृत हो तभी अनहद धुन मैं निवास होता है । है प्रभु जी
आप दर्शन दीजिये संत प्रार्थना करते हैं ।
(क्रमशः)

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