रविवार, 16 मार्च 2025

*भर्तृहरि*

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*दादू एता अविगत आप थैं, साधों का अधिकार ।*
*चौरासी लख जीव का, तन मन फेरि सँवार ॥*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*छप्पय-*
*भर्तृहरि*
*भोगराज भ्रम जान के, भक्ति करी है भरतरी ॥*
*तर तीव्र सु वैराग्य, त्रिलोकी तृण कर लेखी१ ।*
*गरक२ भजन के माहिं, ज्ञान सम आतम देखी ।*
*कंचन आधा रेत, तिजारे रहकर कीया ।*
*शूली देने लगे, हर्या अंकूर सु लीया ॥*
*गुरु गोरक्ष कृपा करी, अमर जहां लौं धरतरी३ ।*
*भोग-राज भ्रम जान के, भक्ति करी है भरतरी ॥३१६॥*
महाराज भर्तृहरि ने राज्यों के भोगों को भ्रम रूप जानकर भगवद्भक्ति की थी । उन्होंने तीव्रतर वैराग्य के द्वारा त्रिलोकी के ऐश्वर्य को भी तृण के समान देखा१ था । वे सदा भगवद्भजन में ही निमग्न२ रहते थे और आत्मज्ञान के द्वारा सभी आत्माओं को समान भाव से देखते थे ।
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अलवर राज्य के तिजारे ग्राम में चातुर्मास के समय एक कुम्हार के घर पर निवास किया था । उन कुम्हार और कुम्हारी में आपके प्रति समान प्रेम नहीं था । चातुर्मास पूरा कर के जाते समय उनके भाव के अनुसार कह गये- "बाबा का हेत माई का कुहेत, आधा कंचन आधा रेत ।" बस, कुम्हार के घर जो बर्तन बनाने के लिये मिट्टी पड़ी थी उससे आधा सोना हो गया और आधी मिट्टी ही पड़ी रही । एक राजा आपको चोर जानकर शूली देने लगा था तब भगवत्कृपा से शूली का लोहे का भाग तो मोम जैसा नर्म हो गया था और काष्ठ के भाग में अंकुर निकल आये थे अलावा लोहे गया था । ग्राम पर गोरक्षनाथजी ने अति महान् कृपा की थी । उसी का फल है कि जब तक धरती३ रहेगी तब तक भर्तृहरि भी अमर रहेंगे ॥३१६॥
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विशेष विवरण - भर्तृहरि उज्जैन के प्रसिद्ध राजा विक्रमादित्य के सौतेले भाई थे । पहले ये ही उज्जैन के राजा थे । एक समय विक्रमादित्य नाराज होकर घर से निकल गये थे । इधर पीछे से भर्तृहरि ने अपनी रानी की दुश्चरित्रता की बातें देखी तब इन्हें संसार के भोगों से वैराग्य हो गया । फिर इन्होंने गुरु गोरक्षनाथजी से दीक्षा ली और आगे चलकर महान् सिद्ध योगी हुये ।
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इनके *श्रृंगार शतक*, *नीतिशतक* और *वैराग्यशतक* नामक सौ-सौ श्लोकों के तीन ग्रंथ प्रसिद्ध हैं । ऐसा ही एक *विज्ञानशतक* और है । व्याकरण के भी आप बड़े पण्डित थे । इनका वाक्यपदीय और हरि कारिका सूत्र प्रसिद्ध हैं । *महाभाष्य दीपिका* और *महाभाष्य त्रिपदी* व्याख्या नामक दो ग्रंथ आप के और बतलाये जाते हैं । प्रथम गोरक्षनाथजी का भर्तृहरि को जिस निमित्त से दर्शन हुआ वह कथा इस प्रकार सुनी जाती है-
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एक समय भर्तृहरि शिकार के लिये वन में एक काले हिरण के पीछे दौड़ते हुये एक वट वृक्ष के पास पहुँचे । वहाँ गोरक्षनाथजी बैठे हुए अपनी मस्ती में अपने आप ही बातें कर रहे थे । उनकी ओर दृष्टि पड़ने से मृग तो कहीं वहीं छिप गया । भर्तृहरि उनकी बातों को सुनकर सोचने लगे ।
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कोई संत हैं । खड़े होकर गोरक्षनाथजी की बातें सुनने लगे । उन बातों को सुनकर भर्तृहरि के नाना विचार होते थे । वे सोते थे वास्तव में ये संत है या पागल । तब बीच में ही भर्तृहरि ने गोरक्षनाथजी से पूछा- आपने इधर कोई काला हिरण देखा ? गोरक्षनाथजी उसका उत्तर न देकर अपनी बातें करते ही रहे ।
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भर्तृहरि ने कहा- तुम कौन हो, मेरी बात नहीं सुनते । फिर भी गोरक्षनाथजी अपनी ही बातें सुनाते रहे जो बड़ी गंभीर अध्यात्म विषय की थीं । भर्तृहरि ने फिर कहा- यहाँ से कोई ग्राम समीप है ? गोरक्षनाथ फिर भी अपने योग के अनुभव की बातों को सुनाने लगे । भर्तृहरि ने सोचा- जो मैं पूछता हूँ उसका उत्तर तो देता नहीं है और ही बातें सुनाता है ।
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इधर सायंकाल भी हो रहा है और हिरण का भी पता नहीं है, वह किधर भाग गया है ? इतने में ही गोरक्षनाथजी का वह पालतू हिरण जिसके पीछे भर्तृहरि लगे हुये थे वहाँ ही आ पहुँचा । भर्तृहरि ने उसका बाण मार कर उसको मार दिया । वह मर कर गोरक्षनाथजी की गोद में पड़ा ।
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तब गोरक्षनाथजी ने कहा- "तुम कौन हो ।" भर्तृहरि बोले- "इस देश का राजा ।" गोरक्षजी ने कहा- "तुमने इस निरपराध मृग को क्यों मारा है ? मार तो वही सकता है जो जीवित कर सके ।" भर्तृहरि ने कहा- "यदि आप जीवित कर दें तो मैं आपका शिष्य हो जाऊँगा ।" गोरक्षनाथजी ने मृग को जीवित कर दिया । भर्तृहरि को स्त्री के व्यवहार से वैराग्य तो हो ही रहा था । वे गोरक्षनाथजी के शिष्य हो गये ।
(क्रमशः)

 

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