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*दादू श्रोता घर नहीं, वक्ता बकै सु बादि ।*
*वक्ता श्रोता एक रस, कथा कहावै आदि ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ साँच का अंग)*
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सवैया ग्रन्थ ~ भाग ३
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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साँच चाणक का अंग १४
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दशा१ करि हीन दिवानों२ बकै कछु,
सो ही कहा कछु कान धरेगो ।
थोथे३ से बाण चलावे बिना बल,
ऐसे व४ गैंडा हो क्यों ही मरेगो ॥
तुपक५ सु पूरि पलितो६ न पावक,
फूंक के फूंके का७ फोर८ करेगो ।
बूंटी न वैद्य टटोरत९ पाटी हो,
रज्जब कैसे व१० पीर हरेगो ॥१०॥
पोले३ बाणों को बिना बल ही चलाता रहे तो ऐसा वह४ दृढ गैंडा कैसे मरेगा ?
बन्दूक५ तो भर ली है किंतु अग्नि से युक्ति बत्ती६ न लगाये और फूंक से फूंके तब वह लक्ष्य को तोड़ेगा८ क्या७ ?
न तो औषधी है और न वैद्य है केवल घाव की पट्टी पर अंगुलायाँ घुमाता९ है तब वह१० अपनी पीड़ा कैसे हटा सकता है ?
वैसे ही कथन के समान अवस्था१ से रहित पागल२ की जैसे कुछ बकता है तो क्या उसे कोई कुछ कान लगा कर हृदय में धारण करेगा ? अर्थात कथन के समान करने वाले का ही उपयोग श्रोत धारण करता है ।
(क्रमशः)
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