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*दादू पद जोड़े का पाइये, साखी कहे का होइ ।*
*सत्य शिरोमणि सांइयां, तत्त न चीन्हा सोइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ साँच का अंग)*
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सवैया ग्रन्थ ~ भाग ३
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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साँच चाणक का अंग १४
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का पद साखि कवित्त के जोरे१ जे,
काया की सौंज२ जु जोरी३ न जाई ।
रसना रस नैन निरखि दश हूं दिशि,
नासिका दास गई लपटाई ॥
इन्द्री अनंग४ सुने श्रवणा गये,
मांहि गये मन शुद्ध न पाई ।
हो रज्जब बात बहु विधि जोरी५ पै,
आतम राम न जोरी रे भाई ॥१२॥
यदि शरीर की सामग्री२ परमार्थ में नहीं लगाई३ तो पद, साखी कवित्त आदि को जोड़ने१ से क्या लाभ है ?
रसना रस में लगी है, नेत्र सांसारिक सौंन्दर्य को देखने दशों दिशाओं जाते हैं । नासिक सुगन्ध में लिपट रही है ।
इन्द्री काम परायण हो रही है । सांसारिक शब्द सुनने के लिये श्रवण तत्पर हैं । भीतर जाने पर मन शुद्ध नहीं मिलता है ।
बातें बहुत प्रकार को जोड़ली हैं परन्तु आत्मा को राम से नहीं जोड़ा तब क्या है ।
(क्रमशः)
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