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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*९. देहात्मा बिछोह को अंग २०/२१*
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चेतन मिश्री देह तृण, तुलत संग देहिं दांम ।
सुन्दर दोउ जुदे भये, तन तृण कोणैं काम ॥२०॥
लम्बे घास(तृण) के साथ यदि मिश्री को सम्पृक्त कर दिया जाय तो उस(तृण) का मूल्य(मोलभाव) बाजार में बढ़ जाता है । (राजस्थान में बीकानेर की फडां मिश्री आज भी प्रसिद्ध है ।) यदि उस दोनों को पृथक् कर दिया जाय तो उस तृण का कोई मूल्य नहीं रह जाता । यही स्थिति चेतनसम्पृक्त देह की भी समझना चाहिये ॥२०॥
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चेतनि तें चेतनि भई, अतिगति शोभित देह ।
सुन्दर चेतनि निकसतें, भई खेह की खेह ॥२१॥
हमारा यह देह, चेतन से सम्पर्क रहने तक ही, संज्ञावान्(सचेष्ट) एवं मनोहर प्रतीत होता है । सुन्दरदासजी कहते हैं - चेतन से सम्पर्क हटने पर इस देह का लोक में राख(भस्म) से भी अधिक तिरस्कार होने लगता है । क्योंकि मरने के बाद इस के जला दिये जाने पर यह 'मुर्दे की राख' कहलाता है ॥२१॥
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चेतनि ही लीयें फिरै, तन कौं सहज सुभाइ ।
सुन्दर चेतनि बाहरी, खैल भैल ह्वै जाइ ॥२२॥
लोक में इस देह की तभी तक उपयोगिता एवं औचित्य है जब तक यह चेतन के साथ सम्पृक्त है । जब भी इस का सम्पर्क चेतन से टूट जाता है तो किसी बाह्य सत्ता का साथ मिलने पर भी, इसकी ओर से सब कुछ खड़भड़(अस्त व्यस्त) एवं नष्ट भ्रष्ट हो गया समझिये ॥२२॥
(क्रमशः)

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