सोमवार, 29 दिसंबर 2025

ईश्वर की उपासना

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*शब्द दूध घृत राम रस,*
*कोई साध बिलोवणहार ।*
*दादू अमृत काढ़ि ले, गुरुमुखि गहै विचार ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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स्वामीजी स्वदेश के लिए आँसू बहाते थे अवश्य, परन्तु साथ ही यह भी भूलते न थे कि इस अनित्य संसार में ईश्वर ही वस्तु है, शेष सभी अवस्तु । स्वामीजी विलायत से लौटने के बाद हिमालय के दर्शन के लिए अलमोड़ा पधारे थे । अलमोड़ा निवासी उन्हें साक्षात् नारायण मानकर उनकी पूजा करने लगे । स्वामीजी नगाधिराज देवतात्मा हिमालय पर्वत के अत्युच्च श्रृंगो को देखकर भावमग्न हो गये ।
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उन्होंने कहा, -"... मेरी अब यही इच्छा है कि में अपने जीवन के शेष दिन इसी गिरिराज में कहीं पर व्यतीत कर दूँ, जहाँ अनेकों ऋषि रह चुके हैं, जहाँ दर्शनशास्त्र का जन्म हुआ था... । यहाँ आते समय जैसे जैसे गिरिराज की एक चोटी के बाद दूसरी चोटी मेरी दृष्टि के सामने आती गयी वैसे वैसे मेरी कार्य करने की समस्त इच्छाएँ तथा भाव, जो मेरे मस्तिष्क में वर्षों से भरे हुए थे, धीरे धीरे शान्त-से होने लगे ... और मेरा मन एकदम उसी अनन्त भाव की ओर खिंच गया जिसकी शिक्षा हमें गिरिराज हिमालय सदैव से देते रहे हैं, जो इस स्थान की वायु तक में भरा हुआ है तथा जिसका निनाद मैं आज भी यहाँ के कलकल बहनेवाले झरनों में सुनता हूँ, और वह भाव है - त्याग ।
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“ 'सर्व वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम् ।'
"अर्थात् इस संसार में प्रत्येक वस्तु में भय भरा है, यह भय केवल वैराग्य से ही दूर हो सकता है, इसी से मनुष्य निर्भय हो सकता है । ...
"भविष्य में शक्तिशाली आत्माएँ इस गिरिराज की ओर आकर्षित होकर चली आयेंगी ।
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यह उस समय होगा जब कि भिन्न भिन्न सम्प्रदायों के आपस के झगड़े नष्ट हो जायेंगे, जब रूढ़ियों के सम्बन्ध का वैमनस्य नष्ट हो जायगा, जब हमारे और तुम्हारे धर्म सम्बन्धी झगड़े बिलकुल दूर हो जायेंगे तथा जब मनुष्यमात्र यह समझ लेगा कि केवल एक ही चिन्तन, धर्म है और वह है स्वयं में परमेश्वर की अनुभूति, और शेष जो कुछ है वह सब व्यर्थ है । यह जानकर कि यह संसार एक धोखे की टट्टी है, यहाँ सब कुछ मिथ्या है और यदि कुछ सत्य है तो वह है ईश्वर की उपासना - केवल ईश्वर की उपासना - तीव्र विरागी यहाँ आयेंगे ।..."
-'भारत में विवेकानन्द' से उद्धृत
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श्रीरामकृष्णदेव कहा करते थे, 'अद्वैत ज्ञान को आँचल में बाँधकर जो इच्छा हो, करो ।' स्वामी विवेकानन्द अद्वैत ज्ञान को आँचल में बाँधकर कर्म-क्षेत्र में उत्तर पड़े थे । संन्यासी को फिर घर, धन, परिवार, आत्मीय, स्वजन, स्वदेश, विदेश से क्या प्रयोजन ? याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी से कहा था, 'ईश्वर को न जानने पर इन सब धन-विद्याओं से क्या होगा ? हे मैत्रेयी, पहले उन्हें जानो, बाद में दूसरी बात ।'
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स्वामीजी ने दुनिया को यही सिखाया । उन्होंने कहा, हे पृथ्वी भर के निवासियों ! पहले विषय का त्याग कर निर्जन में भगवान की आराधना करो, उसके बाद जो चाहो, करो, किसी में दोष नहीं । चाहे स्वदेश की सेवा करो या परिवार का पालन करो, किसी से दोष न होगा; क्योंकि तुम उस समय समझोगे कि सर्वभूतों में वे ही विद्यमान हैं, उनको छोड़ और कुछ भी नहीं है - परिवार, स्वदेश उनसे अलग नहीं हैं ।
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भगवान के साक्षात्कार करने के बाद देखोगे, वे ही सर्वत्र विद्यमान हैं । वशिष्ठ ने श्रीरामचन्द्रजी से कहा था, 'राम, तुम संसार को छोड़ना चाहते हो, आओ, मेरे साथ विचार करो; यदि ईश्वर इस संसार से अलग हों तो इसे त्याग देना ।*(*योगवशिष्ठ) श्रीरामचन्द्र ने आत्मा का साक्षात्कार किया था; इसीलिए चुप रह गये ।
(क्रमशः)

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