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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१५. मन कौ अंग १७/२०*
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सुन्दर यहु मन नीच है, करै नीच ही कर्म ।
इनि इन्द्रिनि कै बसि पर्यौ, गिनै न धर्म अधर्म ॥१७॥
हमारा मन अतिशय नीच वृत्ति वाला है; क्योंकि यह बहुत ही हीन कर्म करता है । यह इन इन्द्रियों के अधीन रहता हुआ निरन्तर हीन कर्म करते समय धर्म या अधर्म का कोई विचार नहीं करता ॥१७॥
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सुन्दर यहु मन भांड है, सदा भंडायौ देत ।
रूप धरै बहु भांति कै, राते पीरे सेत ॥१८॥
हमारा यह मन तो भांड(विदूषक) है । यह सदा हीन वृत्ति वाला अभिनय करता रहता है । यह विभिन्न प्रकार के अभिनय(रूप धारण) करता रहता है, कभी लाल, कभी पीले या कभी श्वेत ॥१८॥
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सुन्दर यहु मन डूम है, मांगत करै न संक ।
दीन भयौ जाचत फिरै, राजा होइ कि रङ्क ॥१९॥
हमारा यह मन डोम(चाण्डाल) के समान आचरण करता हुआ दिन भर गलियों में माँगता ही रहता है, ऐसा करने में इसे कोई लज्जा का भी अनुभव नहीं होता । यह तो प्रत्येक व्यक्ति से मांगते समय इतना भी ध्यान नहीं करता कि सामने वाला रंक(देने में असमर्थ) है या राजा(देने में समर्थ) ॥१९॥
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सुन्दर यहु मन रासिभौ, दौरि बिखै कौं जात ।
गदही कै पीछै फिरै, गदही मारै लात ॥२०॥
हमारा यह मन तो गदहे के समान आचरण करता है; क्योंकि यह विषयवासना में लिप्त रहता हुआ दिन रात गदहियों(कुरूप, या सुरूप नारियों) के पीछे दौड़ता रहता है । जबकि ये गदहियाँ उसे लात मारती(अपमानित करती) रहती है तो भी यह है कि उन से ऐसे अपमानित हो(लात खा) कर भी उन के पीछे ही लगा रहता है ॥२०॥
(क्रमशः)

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