मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

ईश्वर का दर्शन ही जीवन का उद्देश्य

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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*लिपै छिपै नहिं सब करै, गुण नहिं व्यापे कोइ ।*
*दादू निश्‍चल एक रस, सहजैं सब कुछ होइ ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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ईश्वर का दर्शन ही जीवन का उद्देश्य है, और इस देश की यही एक विशेषता है । पहले यह और उसके बाद दूसरी बातें । पहले से ही राजनीति की बातें करने से न चलेगा, पहले एकचित्त होकर भगवान का ध्यान-चिन्तन करो, हृदय के बीच में उनके अनुपम रूप का दर्शन करो ।
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उन्हें प्राप्त करने के बाद तब स्वदेश का कल्याण कर सकोगे; क्योंकि उस समय तुम्हारा मन अनासक्त होगा । 'मेरा देश' कहकर सेवा नहीं - 'सर्वभूतों में ईश्वर हैं' यह कहकर उनकी सेवा कर सकोगे । उस समय स्वदेश-विदेश की भेद-बुद्धि नहीं रहेगी । उस समय ठीक समझा जा सकेगा कि जीव का कल्याण किससे होता है ।
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श्रीरामकृष्णदेव कहा करते थे, "जो लोग दाँव खेलते हैं, वे खेल की चाल ठीक ठीक समझ नहीं सकते । जो लोग खेल से अलग रहकर पास बैठे-बैठे खेल देखते रहते हैं, वे दूर से अच्छी चाल दे सकते हैं ।" कारण देखनेवाला खेल में आसक्त नहीं है ।
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एकान्त में बहुत दिनों तक साधना करके राग-द्वेष से मुक्त उदासीन अनासक्त जीवन्मुक्त महापुरुष ने जो कुछ उपलब्धि की है उसके सामने उन्हें और कुछ भी अच्छा नहीं लगता -
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।
यस्मिन् स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥ - गीता ।
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हिन्दुओं की राजनीत्ति, समाजनीति, ये सभी धर्मशास्त्र हैं । मनु, याज्ञवल्क्य, पराशर आदि महापुरुष इन सब धर्मशास्त्रों के प्रणेता हैं । उन्हें किसी भी चीज की आवश्यकता नहीं थी । फिर भी, भगवान का निर्देश पाकर, गृहस्थों के लिए, उन्होंने शास्त्रों की रचना की है । वे उदासीन रहकर दाँव-खेल की चाल बता दे रहे हैं, इसीलिए देश-काल-पात्र की दृष्टि से उनकी बातों में एक भी भूल होने की सम्भावना नहीं है ।
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स्वामी विवेकानन्द भी कर्मयोगी हैं । उन्होंने अनासक्त होकर परोपकार-व्रतरूपी, जीव-सेवारूपी कर्म किया है; इसीलिए कर्मियों के सम्बन्ध में उनका इतना मूल्य है । उन्होंने अनासक्त होकर इस देश का कल्याण किया है, जिस प्रकार प्राचीनकाल के महापुरुषगण जीव के मंगल के लिए सदैव प्रयत्नशील रहे हैं ।
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इस निष्काम धर्म के पालन के लिए हम भी उनके चरण-चिह्नों का अनुसरण कर सकें तो कितना अच्छा हो ! परन्तु यह बात है बहुत कठिन । पहले भगवान को प्राप्त करना होगा । इसके लिए स्वामी विवेकानन्दजी की तरह त्याग और तपस्या करनी होगी । तब यह अधिकार प्राप्त हो सकता है ।
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धन्य हो तुम त्यागी वीर महापुरुष ! तुमने वास्तव में गुरुदेव के चरण-चिह्नों का अनुसरण किया है । गुरुदेव का महामन्त्र - पहले ईश्वर-प्राप्ति, उसके बाद दूसरी बात - तुम्हीं ने साधित किया है । तुम्हीं ने समझा था, ईश्वर छोड़ने पर यह संसार यथार्थ में स्वप्न की तरह है, गोरख-धन्धा है ।
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इसीलिए सब कुछ छोड़कर तुमने पहले ईश्वर-प्राप्ति की साधना की थी । जब तुमने देखा, सर्व वस्तुओं के प्राण वे ही हैं, जब तुमने देखा उनके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है, तब फिर इस संसार में तुमने मन लगाया । तब हे महायोगिन् ! सर्वभूतों में स्थित उसी हरि की सेवा के लिए तुम फिर कर्मक्षेत्र में उत्तर आये ।
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उस समय सभी तुम्हारे गम्भीर असीम प्रेम के अधिकारी बने - हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, विदेशी, स्वदेशवासी, धनी, निर्धन, नर, नारी सभी को तुमने प्रेमालिंगन-दान किया है । तुमने नारद, जनक आदि की तरह लोक-शिक्षा के लिए कर्म किया है ।
(क्रमशः)

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