सोमवार, 12 जनवरी 2026

श्रीरामकृष्णदेव की बात

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*जब मैं साँचे की सुधि पाई ।*
*तब तैं अंग और नहीं आवै,*
*देखत हूँ सुखदाई ॥*
*ता दिन तैं तन ताप न व्यापै,*
*सुख दुख संग न जाऊँ ।*
*पावन पीव परस पद लीन्हा,*
*आनंद भर गुन गाऊँ ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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अब स्वामीजी श्रीरामकृष्णदेव की बात कह रहे हैं, -
"... एक (शंकराचार्य) का था अद्भुत मस्तिष्क, और दूसरे(चैतन्य) का था विशाल हृदय । अब एक ऐसे अद्भुत पुरुष के जन्म लेने का समय आ गया था, जिनमें ऐसा ही हृदय और मस्तिष्क दोनों एक साथ विराजमान हों, जो शंकर के अद्भुत मस्तिष्क एवं चैतन्य के अद्भुत, विशाल, अनन्त हृदय के एक ही साथ अधिकारी हों....
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जो देखें कि सब सम्प्रदाय एक ही आत्मा, एक ही ईश्वर की शक्ति से चालित हो रहे हैं और प्रत्येक प्राणी में वही ईश्वर विद्यमान है, जिनका हृदय भारत में अथवा भारत के बाहर दरिद्र, दुर्बल, पतित सब के लिए पानीपानी हो जाय, लेकिन साथ ही जिनकी विशाल बुद्धि ऐसे महान् तत्त्वों को पैदा करे, जिनसे भारत में अथवा भारत के सब विरोधी सम्प्रदायों में समन्वय साधित हो और इस अद्भुत समन्वय द्वारा एक ऐसे सार्वभौमिक धर्म को प्रकट करे, जिससे हृदय और मस्तिष्क दोनों की बराबर उन्नति होती रहे ।
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एक ऐसे ही पुरुष ने जन्म ग्रहण किया और मैंने वर्षों तक उनके चरण तले बैठकर शिक्षा-लाभ का सौभाग्य प्राप्त किया । ऐसे एक पुरुष के जन्म लेने का समय आ गया था, इसकी आवश्यकता पड़ी थी, और वे आविर्भूत हुए । सब से अधिक आश्चर्य की बात यह थी कि उनका समग्र जीवन एक ऐसे शहर के पास व्यतीत हुआ जो पाश्चात्य भावों से उन्मत्त हो रहा था, भारत के सब शहरों की अपेक्षा जो विदेशी भावों से अधिक भरा हुआ था ।
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उनमें पोथियों की विद्या कुछ भी न थी, ऐसे महाप्रतिभासम्पन्न होते हुए भी वे अपना नाम तक नहीं लिख सकते थे, किन्तु हमारे विश्वविद्यालय के बड़े बड़े उपाधिधारियों ने उन्हें देखकर एक महाप्रतिभाशाली व्यक्ति मान लिया था । वे एक अद्भुत महापुरुष थे ।
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यह तो एक बड़ी लम्बी कहानी है, आज रात को आपके निकट उनके विषय में कुछ भी कहने का समय नहीं है । इसलिए मुझे भारतीय सब महापुरुषों के पूर्णप्रकाश-स्वरूप युगाचार्य भगवान श्रीरामकृष्ण का उल्लेख भर करके आज समाप्त करना होगा । उनके उपदेश आजकल हमारे लिए विशेष कल्याणकारी हैं । उनके भीतर जो ऐश्वरिक शक्ति थी, उस पर विशेष ध्यान दीजिये ।
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वे एक दरिद्र ब्राह्मण के लड़के थे । उनका जन्म बंगाल के सुदूर, अज्ञात, अपरिचित किसी एक गाँव में हुआ था । आज यूरोप, अमरीका के सहस्रों व्यक्ति वास्तव में उनकी पूजा कर रहे हैं, भविष्य में और सहस्त्रों मनुष्य उनकी पूजा करेंगे । ईश्वर की लीला कौन समझ सकता है ! हे भाइयों, आप यदि इसमें विधाता का हाथ नहीं देखते तो आप अन्धे हैं, सचमुच जन्मान्ध हैं ।
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यदि समय मिला, यदि आप लोगों से आलोचना करने का और कभी अवकाश मिला तो आपसे इनके सम्बन्ध में विस्तारपूर्वक कहूँगा; इस समय केवल इतना ही कहना चाहता हूँ कि यदि मैंने जीवन भर में एक भी सत्य वाक्य कहा है तो वह उन्हीं का वाक्य है; पर यदि मैंने ऐसे वाक्य कहे हैं जो असत्य, भम्रपूर्ण अथवा मानवजाति के लिए हितकारी न हों, तो वे सब मेरे ही वाक्य हैं, उनके लिए पूरा उत्तरदायी मैं ही हूँ ।"
-'भारतीय व्याख्यान' से उद्धृत
(क्रमशः)

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