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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*शरण तुम्हारी केशवा, मैं अनन्त सुख पाया ।*
*भाग बड़े तूँ भेटिया, हौं चरणौं आया ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*ॐ नमो भगवते रामकृष्णाय*
(१)
आचण्डालाप्रतिहतरयो यस्य प्रेमप्रवाहः
लोकातीतोऽप्यहह न जहौ लोककल्याणमार्गम् ।
त्रैलोक्येऽप्यप्रतिममहिमा जानकीप्राणबन्धः
भक्त्या ज्ञानं वृतवरवपुः सीतया यो हि रामः ॥
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(२)
स्तब्धीकृत्य प्रलयकलितम्वाहवोत्थं महान्तम्
हित्वा रात्रिं प्रकृतिसहजामन्धतामिस्रमिश्राम् ॥
गीतं शान्तं मधुरमपि यः सिंहनादं जगर्ज ।
सोऽयं जातः प्रथितपुरुषो रामकृष्णस्त्विदानीम् ॥
और एक स्तोत्र बेलुर मठ में तथा वाराणसी, मद्रास, ढाका आदि सभी मठों में आरती के समय गाया जाता है ।
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इस स्तोत्र में स्वामीजी कह रहे हैं - "हे दीनबन्धो, तुम सगुण हो, फिर त्रिगुणों के परे हो, रातदिन तुम्हारे चरणकमलों की आराधना नहीं कर रहा हूँ इसीलिए मैं तुम्हारी शरण में आया हूँ । मैं मुख से आराधना कर रहा हूँ, ज्ञान का अनुशीलन कर रहा हूँ, परन्तु कुछ भी धारणा करने में असमर्थ हूँ इसीलिए तुम्हारी शरण में आया हूँ ।
तुम्हारे चरणकमलों का चिन्तन करने से मृत्यु पर विजय प्राप्त होती है, इसीलिए मैं तुम्हारी शरण में आया हूँ । हे दीनबन्धो, तुम ही जगत् की एकमात्र प्राप्त करने योग्य वस्तु हो, मैं तुम्हारी शरण में आया हूँ । 'त्वमेव शरणं मम दीनबन्धो !' "
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ॐ ह्री ऋतं त्वमचलो गुणजित् गुणेड्यः
नक्तन्दिवं सकरुणं तव पादपद्मम् ।
मोहंकषं बहुकृतं न भजे यतोऽहम्
तस्मात्त्वमेव शरणं मम दीनबन्धो ॥१॥
भक्तिर्भगश्च भजनं भवभेदकारि
गच्छन्त्यलं सुविपुलं गमनाय तत्त्वम् ।
वक्त्रोद्धृतन्तु हृदि मे न च भाति किंचित्
तस्मात्त्वमेव शरणं मम दीनबन्धो ॥२॥
तेजस्तरन्ति तरसा त्वयि तृप्तृष्णाः
रागे कृते ऋतपथे त्वयि रामकृष्णे ।
मर्त्यामृतं तव पदं मरणोर्मिनाशम्
तस्मात्त्वमेव शरणं मम दीनबन्धो ॥३॥
कृत्यं करोति कलुषं कुहकान्तकारि
ष्णान्तं शिवं सुविमलं तव नाम नाथ ।
यस्मादहं त्वशरणो जगदेकगम्य
तस्मात्त्वमेव शरणं मम दीनबन्धो ॥४॥
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स्वामीजी ने आरती के बाद श्रीरामकृष्ण-प्रणाम सिखाया है । उसमें श्री रामकृष्णदेव को अवतारों में श्रेष्ठ कहा गया है ।
"स्थापकाय च धर्मस्य सर्वधर्मस्वरूपिणे ।
अवतारवरिष्ठाय रामकृष्णाय ते नमः ॥
(क्रमशः)

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