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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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*१६. चाणक को अंग ९/१२*
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बैठ्यौ आसन मारि करि, पकरि रह्यौ मुख मौंन ।
सुन्दर सैन बतावतें, सिद्ध भयौ कहि कौंन ॥९॥
केवल सिद्धासन लगाकर बैठने से, अथवा मौन व्रत रखने से या हाथ या आंख आदि के सङ्केत द्वारा बात करने से कोई आज तक सिद्ध हुआ है कि तूं ही हो जायगा ! ॥९॥
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कोउ करै पय पान कौं, कौंन सिद्धि कहि बीर ।
सुन्दर बालक बाछरा, ये नित पीवहिं खीर ॥१०॥
कोई, समस्त जीवनपर्यन्त, केवल दुग्धाहार करता रहे तो क्या उसे सिद्धि मिल जायगी ! अरे भाई ! तब तो ये दुधमुंहे शिशु या गौ के बछड़े सभी सिद्ध कहलाने लगेंगे; क्योंकि ये भी नित्य केवल दूध ही पीते हैं ॥१०॥
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कोऊ होत अलौनिया, खांहि अलौंनौ नाज ।
सुन्दर करहिं प्रपंच बहु, मान बढावण काज ॥११॥
कोई तथाकथित साधक लवण(नमक) का त्याग कर जीवनपर्यन्त अलोना(लवणरहित) अन्न खाते हैं, परन्तु स्वसम्मानवृद्धयर्थ अन्य समस्त जगत्प्रपञ्च करते रहते हैं ॥११॥
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धोवन पीवै बावरे, फांसू बिहरन जांहिं ।
सुन्दर रहै मलीन अति, समंझ नहीं घट मांहिं ॥१२॥
कुछ अन्य मूर्ख साधक चावल का धोवन पी कर शरीर - निर्वाह करते हैं, तथा कुछ साधक काँटों पर सोते हैं, कोई जीवनपर्यन्त स्नान न करते हुए अतिशय मलिन रहते हैं; क्योंकि ऐसे साधकों ने किसी सच्चे गुरु से साधना का उपदेश ग्रहण किया हो नहीं ॥१२॥
(क्रमशः)

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