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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*समर्थ शूरा साधु सो, मन मस्तक धरिया ।*
*दादू दर्शन देखतां, सब कारज सरिया ॥*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(८)कर्मयोग और दरिद्रनारायण-सेवा*
श्रीरामकृष्णदेव कहा करते थे, कर्म सभी को करना पड़ता है । ज्ञान, भक्ति और कर्म - ये तीन ईश्वर के पास पहुँचने के पथ हैं । गीता में है, - साधु-गृहस्थ पहले-पहल चित्तशुद्धि के लिए गुरु के उपदेशानुसार अनासक्त होकर कर्म करे । 'मैं करनेवाला हूँ' यह अज्ञान है, 'धन-जन, काम-काज मेरे हैं' - यह भी अज्ञान है ।
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गीता में है, अपने को अकर्ता मानकर, ईश्वर को फल सौंपकर काम करना चाहिए । गीता में यह भी है कि सिद्धि प्राप्त करने के बाद भी प्रत्यादिष्ट होकर कोई कोई, जैसे जनक आदि, कर्म करते हैं । गीता में जो कर्मयोग है, वह यही है । श्रीरामकृष्णदेव भी यही कहते थे । इसीलिए कर्मयोग बहुत कठिन है । बहुत दिन निर्जन में ईश्वर की साधना किये बिना, अनासक्त होकर कर्म नहीं किया जा सकता ।
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साधना की अवस्था में श्रीगुरु के उपदेश की सदा ही आवश्यकता है । उस समय कच्ची स्थिति रहती है इसलिए किस ओर से आसक्ति आ पड़ेगी, जाना नहीं जाता । मन में सोच रहा हूँ, 'मैं अनासक्त होकर, ईश्वर को फल समर्पण कर, जीवसेवा, दान आदि कर्म कर रहा हूँ ।' परन्तु वास्तव में, सम्भव है, मैं यश के लिए ही यह सब कर रहा हूँ, और खुद नहीं समझ पा रहा हूँ ।
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जो आदमी गृहस्थ है, जिसके घर, परिवार, आत्मीय, स्वजन और अपना कहने की चीजें हैं, उसे देखकर निष्काम कर्म, अनासक्ति और दूसरे के लिए स्वार्थ का त्याग, ये सब बातें सीखना बहुत कठिन है । परन्तु सर्वत्यागी, कामिनी-कांचन-त्यागी सिद्ध महापुरुष यदि निष्काम कर्म करके दिखायें तो लोग आसानी से उसे समझ सकते हैं और उनके चरण-चिन्हों का अनुसरण कर सकते हैं ।
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स्वामी विवेकानन्द कामिनी-कांचन त्यागी थे । उन्होंने एकान्त में श्रीगुरु के उपदेश से बहुत दिनों तक साधना करके सिद्धि प्राप्त की थी । वे वास्तव में कर्मयोग के अधिकारी थे । वे संन्यासी थे; वे चाहते तो ऋषियों की तरह अथवा अपने गुरुदेव श्रीरामकृष्णदेव की तरह केवल ज्ञान-भक्ति लेकर रह सकते थे । परन्तु उनका जीवन केवल त्याग का उदाहरण दिखाने के लिए नहीं हुआ था ।
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सांसारिक लोग जिन सब वस्तुओं को ग्रहण करते हैं, उनसे अनासक्त होकर किस प्रकार व्यवहार करना चाहिए, यह भी नारद, शुकदेव तथा जनक आदि की तरह स्वामीजी लोकसंग्रह के लिए दिखा गये हैं । वे धन-सम्पत्ति आदि को काक-विष्ठा की तरह समझते अवश्य थे और स्वयं उनका उपयोग नहीं करते थे, परन्तु फिर भी जीवसेवा के लिए उनका किस प्रकार व्यवहार करना चाहिए इसके बारे में उपदेश देकर वे स्वयं भी करके दिखा गये हैं ।
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उन्होंने विलायत व अमरीका के मित्रों से जो धन एकत्रित किया था, वह सारा धन जीवों के कल्याण के लिए व्यय किया । उन्होंने स्थान स्थान पर - जैसे कलकत्ते के पास बेलुड़ में, अलमोड़ा के पास मायावती में, काशीधाम में तथा मद्रास आदि स्थानों में - मठों की स्थापना की । अनेक स्थानों में - दिनाजपुर, वैद्यनाथ, किशनगढ़, दक्षिणेश्वर आदि स्थानों में - दुर्भिक्ष-पीड़ितों की सेवा की । दुर्भिक्ष के समय अनाथाश्रम बनाकर मातृ-पितृहीन अनाथ बालक-बालिकाओं की रक्षा की ।
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राजपुताना के अन्तर्गत किशनगढ़ नामक स्थान में अनाथाश्रम की स्थापना की । मुरशिदाबाद के निकट (भीवदा) सारगाछी गाँव में तो अभी तक उसी समय का अनाथश्रम चल रहा है । हरिद्वार के निकट कनखल में रोगपीड़ित साधुओं के लिए स्वामीजी ने सेवाश्रम की स्थापना की । प्लेग के समय रोगियों की विपुल धन व्यय करके सेवा करायी । वे दीन, दुःखी तया असहायों के लिए अकेले बैठकर रोते थे और मित्रों से कहते थे, "हाय ! इन लोगों को इतना कष्ट है कि इन्हें ईश्वर-चिन्तन का अवसर तक नहीं है !"
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गुरु से उपदिष्ट कर्मों और नित्य-कर्मों को छोड़, दूसरे कर्म तो बन्धन के कारण हैं । वे संन्यासी थे, उन्हें कर्म की क्या आवश्यकता ?
"... 'अपने अपने कर्मों का फल-भोग जगत् में निश्वित'
कहते हैं सब, 'कारण पर है सभी कार्य अवलम्बित;
फल अशुभ, अशुभ कर्मों के; शुभ कर्मों के हैं शुभ फल,
किसकी सामर्थ्य बदल दे, यह नियम अटल औ' अविचल ?
इस मृत्युलोक में जो भी करता है तनु को धारण,
बन्धन उसके अंगों का होता नैसर्गिक भूषण ।'
यह सच है, किन्तु परे जो गुण नाम-रूप से रहता,
वह नित्य मुक्त आत्मा है, स्वच्छन्द सदैव विचरता ।
'तत् त्वमसि' - वहीं तो तुम हो, यह ज्ञान करो ह्रदयांकित
फिर क्या चिन्ता संन्यासी, सानन्द करो उद्घोषित –
'ॐ तत् सत् ॐ !'..."...... - 'कवितावली' से उद्धृत
(क्रमशः)
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